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Thursday, July 20, 2017

tilak aazad hue -23july ko


२३ जुलाई
चन्द्र शेखर आज़ाद  और बाल गंगाधर तिलक के जन्म दिन पर विशेष 

२३ जुलाई ,इतिहास के पन्ने  की वह तारीख ,जो याद  दिलाती है भारत माता के उन सपूतों की ,जिन्होंने गुलामी की ज़ंजीरों में जकड़ी अपनी  मातृभूमि को आज़ाद करने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। इसी तारीख को जन्मे थे ये वीर भूमि के वीर पुत्र। आज उनके जन्म दिन पर याद करते है उनकी वीर गाथा को  ....   



















चन्द्र शेखर आज़ाद

१५ अगस्त ,१९४७ को देश आजाद  हुआ।  आजादी का श्रेय  किसे  दिया जाए ?  उन्हें , जिन्हें राष्ट्रवादी कहा जाता था  या उन्हें जिन्हें क्रांतिकारी  कहा  जाता  था ?  दिमाग वालो  को  या दिल वालो को ?  किसी  हिंदी  फिल्म  के सुपर  हिट  होने  पर  सफलता  का सारा श्रेय  फिल्म के नायक नायिका  को  मिलता  है  और  थोड़ा बहुत फिल्म के निर्देशक  को भी  किन्तु  फिल्म की कथा ,पटकथा ,संवाद  लिखने  वाला लेखक  ,गीतकर - संगीतकर और  तकनीशियन  परदे के पीछे  गुमनाम  ही रह जाते  है।   आजादी  की सफलता  की  कहानी  भी  बहुत  कुछ  super hit हिंदी फिल्म   की तरह ही है।  गाँधी  और  नेहरू   आजादी की सफलता के नायक बन गए किन्तु  वे सब क्रन्तिकारी कही गुमनामी के अँधेरे  में   खो  गए  , जबकि  देश  को  आजाद  करने  में उन क्रांतिकारियों की भी अहम  भूमिका  थी।  अंग्रेजी  हुकूमत  को  डर  अहिंसा  के पुजारी और शांतिदूत कहलानेवाले   गाँधी या नेहरू  से नही बल्कि  मातृभूमि के लिए  सिर  पर   कफ़न  बांधकर और  जान हथेली  पर लेकर  घूमने वाले क्रांतिकारियों  से था।  ऐसे ही  क्रांतिकारियों  में  एक  क्रन्तिकारी की कहानी आपको सुनाता हूँ, जिसने स्वतन्त्रता  संग्राम की काकोरी डकैती  कांड , साण्डर्स   हत्याकांड  , असेम्बली  बम  कांड  जैसी प्रमुख  घटनाओ   में शानदार सह नायक  की भूमिका निभाई  थी ,लेकिन जिसकी  भूमिका किसी नायक से कम नहीं थी । स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में जिस युवक को सहनायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है ,उसे हम अपनी कहानी का नायक बनायेगे।



यह वह दौर था जब गाँधीजी भारतीय जनता के नायक बने हुए थे। उनकी एक आवाज़ पर जनता मर-मिटने के लिए तैयार हो जाती थी। बात  उन दिनों की है जब गाँधी जी  का असहयोग आंदोलन  चरम  पर था - शायद  ही कोई भारतीय  हो , जो इस  आंदोलन  से प्रभावित न रहा हो।  गांधीजी  से प्रभावित १५-१६ का एक युवक  आंदोलन में कूद जाता है , जिसे गिरफ्तार कर लिया जाता है और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है। मजिस्ट्रेट  द्वारा  नाम पूछने पर युवक अपना नाम आजाद बतलाता है ।  उसे  १५  बैत  की सजा  सुनाई  जाती है। हर   बेत  पर वह किशोर  वंदे  मातरम  , 'महात्मा गाँधी और भारत माता की जय  का उद्घोष  करता है। यही युवक हमारी कहानी का नायक है।
बाद में नायक का गांधीजी के प्रति मोह भंग हो जाता है। कारण  था -गांधीजी द्वारा चोर-चौरी कांड के बाद असहयोग आंदोलन बंद कर देने की घोषणा। नायक की मुलाकात क्रन्तिकारी प्रणवेश चटर्जी से होती है। प्रणवेश  चटर्जी नायक का परिचय हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक राम प्रसाद बिस्मिल से कराता है। दल में शामिल होने के लिए नायक अग्नि को साक्षी मानकर अपना सबकुछ समर्पण कर देने की प्रतिज्ञा करता है। दल में शामिल होने  के बाद नायक गांधीजी के असहयोग वापस लेने से नाराज़ विद्रोही क्रन्तिकारी राम कृष्ण को दल  में शामिल करने का कार्य कर अपने बुद्धि चातुर्य का परिचय देता है।
नायक और उसके साथियों को अपनी योजनओं को अंजाम  देने के लिए धन की ज़रुरत थी। इस पर नायक कहता है -
टूटी हुई बोतल है ,टूटा हुआ पैमाना 
सरकार तुझे दिखा देंगे ठाठ फकीराना
क्रांतिकारी दल अपनी योजनाओ को अंजाम तक पहुँचाने के लिए धन की कमी महसूस करता है ,जिसके लिए दल के लोग डकैती डालकर धन एकत्र करने की योजना बनाते है। इस योजना में नायक के साथ थे -राम प्रसाद बिस्मिल ,राजेन्द्र लाहिड़ी ,रोशन सिंह ,शचीन्द्र नाथ बक्शी,राम कृष्ण खत्री ,मन्मथनाथ गुप्ता और अशफाकउल्ला खाँ। पहले तो अमीरों को लूटने की योजना बनाई जाती है किन्तु इससे दल की प्रतिष्ठा पर विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका से सरकारी धन को लूटने की योजना पर सहमति बनती  है। इसी योजना से जन्मा था काकोरी डकैती कांड। इस घटना के बाद नायक ब्रिटिश हुकूमत डकैती में शामिल क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करने में जुट जाती है। नायक गिरफ़्तारी से बचने के लिए झाँसी पहुँच जाता  है ,जहाँ वह कुछ दिन एक  मंदिर में साधु वेश में रहता है ,उसके बाद कानपुर आ  जाता है और एक अन्य क्रांतिकारी गणेश विद्यार्थी से मिलता है। यही उसकी मुलाकात होती   है -भगत सिंह से। नायक भगत सिंह के साथ मिलकर काकोरी डकैती कांड में गिरफ्तार  साथियों को छुड़ाने की योजना बनाता है ,किन्तु योजना असफल हो जाती है। काकोरी डकैती कांड के साथी राम प्रसाद बिस्मिल ,राजेन्द्र लाहिड़ी ,रोशन सिंह और अशफाकउल्ला खां को फाँसी  दे दी जाती है। इसी बीच हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट आर्मी हो जाता है।
उधर लाल लाजपत राय  साइमन कमीशन  के विरोध में निकाले गए जुलूस में पुलिस मुठभेड़ में बुरी तरह ज़ख़्मी हो जाते है और उसके कुछ दिन बाद ही लाला  लाजपत राय की मौत हो जाती है। लाला  लाजपत  राय  की मौत का बदला  लेने के लिए नायक अपने साथी भगत सिंह ,राजगुरु और जय गोपाल के साथ मिलकर अंग्रेज अफसर साण्डर्स की हत्या कर देता है।
अहिंसा के पुजारियोंऔर शांतिदूतों को अंग्रेजी सरकार विषहीन साँप की तरह समझती थी,अतएवं अंग्रेजी सरकार उनकी ओर से निश्चिन्त थी। शांति और विनम्रता की याचना शायद अंग्रेजों को सुनाई नहीं दे रही थी। अंग्रेजों के कान खोलने के लिए नायक और उसके साथियों द्वारा असेम्बली पर बम धमाका करने की योजना बनाई जाती है किंतु किन्ही कारणों से नायक को इस जोखिम से अलग रखा जाता है। असेम्बली में बम फेंकने की योजना को अंजाम दिया भगत और बटुकेश्वर दत्त ने। भगतसिंह और और उसके साथियों को गिरफ्तार कर उन पर मुक़दमा चलाया गया। भगत सिंह ,राजगुरु और सुख देव को फांसी की सजा सुनाई गई। अंग्रेजों पर गांधीजी का प्रभाव देखते हुए भगत सिंह और साथियों को फाँसी  की सजा से बचाने  के लिए गांधीजी से गुहार की गयी किन्तु अहिंसा के पुजारी कहलानेवाले गांधीजी को भारत माता के  देश भक्त पुत्रों से ज्यादा अपने आदर्श और सिंद्धान्त प्रिय थे। इस मामले में हस्तक्षेप करना उन्हें अपने आदर्श और सिंद्धान्त के खिलाफ लगा और उन्होंने  किसी भी प्रकार की सहायता करने से इंकार कर दिया। अहिंसा और शांति का राग गुनगुनाने वालों का क्रांतिकारियों के प्रति उपेक्षित व्यवहार को देखकर कहा कहा होगा -
शहीदों की चिताओं पर पड़ेंगे खाक के ढेले 
वतन पर मिटानेवालों कायही  निशा होगा
उधर साण्डर्स  हत्या कांड के लिए नायक को ज़िम्मेदार मान रही अंग्रेजी सरकार नायक को जासूसी कुत्तों की तरह खोज रही थी,लेकिन नायक ने भी अंग्रेजों के हाथ न लगने की कसम खाई थी । असेंबली बम कांड के बाद नायक दल लगभग टूट सा गया था। नायक इलाहबाद आता है और नेहरू जी से मिलता है किन्तु अहिंसा और शांति के पुजारी के इस अनुयायी ने भी कोई उदारता नहीं दिखलाई। क्रोध से आग बगूला  हुआ नायक   अल्फ्रेड पार्क आता है। तभी किसी मुखबिर के द्वारा पुलिस को नायक के अल्फ्रेड पार्क में होने की खबर दे दी जाती है। नायक के अल्फ्रेड पार्क में होने की खबर पाकर पुलिस अल्फ्रेड पार्क को चारों  ओर से घेरकर फायरिंग करती है ,नायक अकेला मुकाबला करता है। इस मुठभेड़ में नायक पुलिस की गोलियों से ज़ख़्मी हो जाता है ,लेकिन खुद को अंग्रेजों के हाथ न लगने देने की सौगंध पूरी करने के लिए आखरी गोली खुद को मारकर इच्छा मृत्यु को प्राप्त कर लेता है। उसने जैसा कहा था -कर दिखाया।वह  कहा करता था -
दुश्मन की गोलियों का सामना  हम करेंगे 
आज़ाद ही रहे है ,आज़ाद ही मरेंगे 
इतिहास गवाह है इस बात का कि देश को जितना नुकसान दुश्मनों ने नहीं पहुचाया ,उससे ज्यादा घर के गद्दारों ने पहुँचाया। कहा है न कि  -कुल्हाड़ी में अगर हत्था ना होता तो लकड़ी के कटने का रस्ता  न होता।
जो कहानी आप पढ़ रहे थे ,वह किसी रील लाइफ की कहानी नहीं  बल्कि रियल लाइफ की कहानी के नायक की थी और उस रियल लाइफ के नायक का नाम था -चन्द्र  शेखर आज़ाद ,जो आज़ाद जिया और आज़ाद मरा ।
चन्द्र  शेखर आज़ाद में वे सारी  खूबियाँ  थी ,जो उसे नायक की पहचान देती है। खान-पान और विचारों की सात्विकता के कारण  उनके साथी उन्हें पंडित जी कहकर संबोधित करते थे। वे रूस की बोल्वेशिक क्रंति से अत्यधिक प्रभावित थे।
आज़ाद ने अपना सब कुछ मातृ भूमि को समर्पित कर दिया था,यहाँ तक कि  माता-पिता के प्रति अपने पुत्र दायित्व को भी । एक बार जब भगत सिंह और साथियों ने उनके परिवार को आर्थिक सहायता देने की बात कही तो आज़ाद ने कहा कि  मुझे निष्काम भाव से कर्म करना है। न मुझे दौलत की चाह है और न शौहरत की।
कहा जाता है कि  इरादों के प्रति सख्त आज़ाद का ह्रदय भीतर से उतना ही कोमल था। फरारी के दिनों में आज़ाद ने जिस घर में शरण ली थी ,उस घर में एक वृद्धा अपनी युवा बेटी के साथ रहती थी । जब विधवा  ने आज़ाद को बतलाया कि  धनाभाव के कारण  वह अपनी बेटी का विवाह नहीं कर पा रही है। उन्होंने उस युवती को बहिन मानते हुए आर्थिक सहायता की।
आज़ाद की भावना शब्द बनकर इस रूप में व्यक्त हुई -
माँ हम विदा हो जाते है ,विजय केतु फहराने आज
तेरी बलिवेदी पर चढ़कर माँ ,निज शीश कटाने आज
मलिन वेश में ये आंसू कैसे ,कम्पित होता है क्यों गात
वीर प्रसूता क्यों रोती है ,जब तक है खंजर हमारे हाथ
धरा शीघ्र ही धसक जाएगी ,टूट जायेंगे ,पर न झुकेंगे तार
विश्व कम्पित हो जायेगा ,होगी जब माँ रण हुँकार
नृत्य करेंगी प्रांगण में फिर-फिर जंग हमारी आज
अरि शीश गिराकर कहेंगे ,भारत भूमि तुम्हारी आज
जब शमशीर कातिल लेगा अपने हाथों में
हज़ारों सिर  पुकार उठेंगे ,कहो कितने की है दरकार



लोकमान्य  बाल  गंगाधर तिलक 

















लोकमान्य  बाल  गंगाधर तिलक  भारतीय विभूतियों के आकाश का  वह देदीप्यमान  नक्षत्र  है ,जो भारत की आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने का दिशा बोध कराता  रहेगा। आज २३ जुलाई को इस महान देश -भक्त का भारत की धरा पर अवतरण हुआ था।
 लोकमान्य  बाल  गंगाधर तिलक न सिर्फ एक,कुशल राजनीतिज्ञ  बल्कि   ,समाज सुधारक ,आध्यात्मिक क्षेत्र के प्रकाण्ड -विद्वान् ,  विचारक -चिंतक , पुस्तकों के लेखक और उग्र  विचारधारा के प्रवर्तक ,जैसे बहुमुखी प्रतिभा से आलोकित व्यक्तिव के धनी  थे।

गुलामी की जंज़ीरों में जकड़े हुए भारतवासियों  की नसों में उबाल  लाने के लिए जिसने कहा था -
अपने हितों के लिए यदि हम स्वयं जागरूक नहीं होंगे तो दूसरा कौन होगा ?हमें इस समय सोना नहीं चाहिए ,हमें अपने लक्ष्य की पूर्ति  के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

इस महान पुरुष के व्यक्तित्व का आकलन उसके कथन से नहीं ,उसके कार्यों से ही किया जा सकता है

लोकमान्य  बाल  गंगाधर तिलक के व्यक्तिव को जानने के लिए उनके जीवन के इतिवृत के पृष्ठों को पलट कर देखना होगा।
कहते है ,पूत के पाँव  पालने में ही नज़र आ जाते है। इस तथ्य को बाल  तिलक ने बचपन में प्रमाणित कर दिया था

बचपन में एक बार जब अध्यापक ने मूंगफली के छिलकों के लिए कक्षा के सभी बच्चों को सजा देनी चाही तो तिलक ने सजा पाने से स्पष्ट मना  कर दिया और कहा कि   जो अपराध मैंने किया ही नहीं उसकी मैं  सजा नहीं पाउँगा।जो यह प्रमाणित करता है कि  तिलक बचपन से ही निर्भीक ,न्याय प्रिय ,और स्पष्टवादी थे।

एक अन्य घटना का यहाँ उल्लेख किया जाना समीचीन होगा जो तिलक के चुनौतियों से खेलने का उदहारण
है -तिलक की गणित विषय में बहुत रूचि थी और अक्सर कठिन -जटिल सवालों को सुलझाने में लगे रहते थे। उनके मित्र ने उनसे पूछा कि  तुम सरल जवाबों की बजाय कठिन सवाल को क्यों  चुनते हो ?तब तिलक ने उत्तर देते हुए कहा कि  कठिन चुनोतियो का सामना करके ही जीवन में आगे बढ़ा जा सकता   है।

तिलक भारतीय-सभ्यता -संस्कृति के प्रबल समर्थक थे। सादा जीवन उच्च विचार रखने वाले तिलक ने कभी पाश्चात्य पहनावा स्वीकार नहीं किया। वे हमेशा सादा  रेशमी धोती पहना  करते थे। प्रतिदिन व्यायाम करते थे। तिलक की स्पष्ट वादिता के लिए इन्हें मि.ब्लंट और शारीरिक सौष्ठव के कारण मि.डेविल कहा जाता था।
तिलक ने जो योग्यता प्राप्त की ,उस योग्यता से वे कोई भी सरकारी पद प्राप्त कर सकते थे किन्तु राष्ट्र सेवा को सर्वोपरि मानते हुए सरकारी सेवा में जाना स्वीकार नहीं किया। एल एल बी की डिग्री पूरी कर लेने के बाद वे आगरकर ,चिपलूणकर और एम.बी.नामजोशी के साथ राष्ट्र सेवा  में जुट  गए। तिलक का मानना था कि  समाज सुधार  से पहले स्वाधीनता की ज्यादा ज़रुरत है। हालाँकि  इस विचारधारा के कारण  उन्हें विरोध भी सहन पड़ा  था। शिक्षा में सुधार के लिए न्यू  इंग्लिश स्कूल की स्थापना की ,जिसका उद्देश्य  देशवासियों की अंतः चेतना  जाग्रत करना  था।आगे चलकर इसे डेकन एजुकेशन सोसाइटी  में तब्दील कर दिया गया।

देशवासियों में जन -जागृति लेन के लिए उन्होंने समाचार पत्रों को माध्यम बनाया और केसरी  तथा मराठा  पत्रों का प्रकाशन किया। जिसमे ब्रिटिश शासकों की नीतियों पर प्रहार किया जाता था।तिलक ने ब्रिटिश सरकार  को हिन्दू विरोधी  और मुस्लिम समर्थक बतलाया। इस कारण उन्हें हिंदूवादी और मुस्लिम विरोधी होने के आरोपों का सामना करना पड़ा।
तिलक सामाजिक कार्यों में भी बढ़ -चढ़ कर हिस्सा लेते थे। १८९६ में अकाल और १९०२ में फैले प्लेग  के समय तिलक ने जैसी तत्परता दिखलाई उससे उनके सामाजिक हितों का प्रहरी होना प्रमाणित हो जाता है।
तिलक जहाँ नारी शिक्षा  और हिंदी को राष्ट्र भाषा बनने के हिमायती थे ,वही बाल-विवाह और छूआ -छूत  के विरोधी भी थे।
प्लेग के दौरान अंग्रेज  अधिकारी सहायता की आड़ लेकर अमानवीय कृत्य भी कर रहे थे। तिलक ने अपने समाचार पत्रों के माध्यम से ब्रिटिश अधिकारियों के द्वारा किये जा रहे दुर्व्यहार को प्रमुखता के साथ छापा।
इसी बीच चापेकर बंधुओ ने   अंग्रेज इंस्पेक्टर रैंड की   हत्या कर दी। तिलक पर  चापेकर बंधुओ को उकसाने और राज द्रोह के लेख छापने का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया। अंतर-राष्ट्रीय  स्तर  पर इस गिफ्तारी पर  प्रतिक्रियाए हुई और तिलक के साथ नरमी बरतते हुए उनकी रिहाई की सिफारिशें की गयी। ,इस पर तिलक को रिहा कर दिया गया।
१८९९ में लार्ड कर्जन के शासनकाल में बंगाल का बटवारा कर दिया गया ,इसका देश व्यापी विरोध हुआ।
यही से कांग्रेस भी दो खेमों गरम और नरम  में बंट  गयी। लाला  लाजपत राय ,विपिन चन्द्र पाल और बाल गंगाधर तिलक गरम दल  में आ गए। गरम दल  बाल पाल लाल की तिकड़ी कहलाती थी।
बंगाल बटवारे पर तिलक के उग्रवादी  विचारों के कारण  उन पर राज द्रोह का आरोप लगाकर उन्हें देश से , निष्कासित कर मांडले  जेल भेज दिया गया। इसी जेल में उन्होंने गीता रहस्य  और द आर्कटिक होम ऑफ़  द  आर्यन पुस्तकें लिखी। १९१४ को तिलक को मांडले जेल से रिहा कर   दिया गया।
भारत लौट कर वे स्वराज प्राप्ति के लिए चलाये जा रहे   श्री मती एनी बेसेंट के  होम रूल आंदोलन से जुड़ गए। जगह -जगह जाकर सभाएं आयोजित करते ,जन-समुदाय को सम्बोधित करते।
स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है ,मैं  इसे लेकर रहूंगा ,इस संकल्प को पूरा  करने में लगे इस महान देश भक्त को १ अगस्त १९२० को मृत्यु ने अपने अंक में भर लिया।
उस महान देश भक्त का तिलक आज भी भारत माता  के ललाट पर दमक रहा है।

 लोकमान्य  बाल  गंगाधर तिलक के जीवन का संक्षिप्त परिचय -
बचपन का नाम -केशव
प्रचलित नाम -बाल  गंगाधर तिलक
सम्मानित उपाधि -लोक मान्य /हिन्दू राष्ट्र वाद का जनक
जन्म -२३  जुलाई ,१८५६
जन्म स्थान चिखली गाँव /जिला -रत्नागिरी (महाराष्ट्र )
पिता -गंगाधर रामचन्द्र तिलक
माता -पार्वती  बाई
पत्नी -तापी (परिवर्तित नाम -सत्य भामा )
संतान -दो पुत्र ,तीन पुत्रियां

 शिक्षा -बीए आनर्स (१८७६ )
            एल एल बी (१८७९ )