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Friday, July 14, 2017

mangal pandey -the great rebal



जन्म तिथि पर विशेष




मंगल पांडेय
१९ जुलाई १९२७
प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत


हरे -भरे वृक्ष पर लगे फल -फूल को देखकर न सिर्फ मन प्रसन्न होता है बल्कि उसकी प्रशंसा में मुख से शब्द भी फूट पड़ते है ,लेकिन हमारा ध्यान उस बीज की ओर नहीं जाता ,जिसने दूसरो को मीठे रसीले फल और शीतल छाया देने के लिए अपने आप को मिटटी में दबा दिया  ... वह मिटटी में दबकर अँधेरे में सड़ा -गला और पूरी तरह से खुद को  मिटटी में मिला दिया। यही बीज अंकुरित हुआ ,पौधा बना  ... पल्लवित हुआ  ... विकसित हुआ और फिर घना छायादार पेड़ बना। इसी तरह जिस स्वतन्त्र देश में स्वतन्त्र नागरिक के रूप में  हम स्वाभिमान के साथ साँस ले रहे .. स्वतन्त्रता के लहलहाते हुए वृक्ष पर उन्नति  ...प्रगति  ... विकास के फल को पकते हुए देखकर खुश हो रहे है ,इस स्वतन्त्रता रुपी वृक्ष  का बीज कौन था ?
किसने अपने प्राण फूंक कर स्वतन्त्रता की अलख जलाई थी ?
किसने अपने प्राणो को बीज बनाकर ज़मीन में दफ़न कर दिया था ?


                                                                 
 उस हुतात्मा का नाम था -मंगल पांडेय


१९ जुलाई १९२७ को उत्तर प्रदेश के फ़ैजाबाद में पैदा हुआ था स्वतंत्रता संग्राम का  यह अग्रदूत ,जिसने राख की परतों के नीचे दबी स्वतंत्रता की  चिनगारी को प्राण फूँककर  सुलगाया था।

ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ  यह बालक अपने पिता के नाम दिवाकर के समान तेजस्वी और माता के नाम निर्भया के समान निर्भीक  ...
 पिता  के कुल और माता की  कोख को जिसने धन्य किया धर्म रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग कर  ...

था एक  मामूली सा सिपाही ईस्ट इंडिया कंपनी की छावनी में नेटिव इन्फेंट्री सेना का ,जो कलकत्ता के नज़दीक बैरकपुर में थी।

जैसे द्रोपदी की सौगंध ने ,जो उसने  दुशासन के सामने ली थी - तेरे रक्त से धोकर ही मै अपने यह खुले हुए केश उस दिन बाँधूँगी .. इस एक वाक्य ने महाभारत खड़ा कर दिया था। उसी तरह उस समय अछूत समझे जाने एक आदमी को जिसे मंगल पांडेय ने पानी पिलाने से मना कर दिया था ,उसने व्यंग करते हुए कहा था -मुझसे तो अछूत होने के कारण घृणा करते हो ,उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ चला जाता है ,जब गाय और सूअर की चर्बी लगा कारतूस मुँह से लगते हो ?
इस वाक्य ने कट्टर ब्राह्मण मंगल पांडेय को विद्रोही बना दिया।
कहा जाता है कि सिपाहियों को एनफील्ड नाम की बंदूकें दी गयी ,जिसे चलाने के लिए पहले कारतूस  को मुँह से खोलना पड़ता था ,जिस पर गाय और सूअर की चर्बी लगी होती थी ।
यह बात पहले किसी को पता नहीं थी। इस सेना के अधिकांश सिपाही या तो ब्राह्मण थे  या फिर मुसलमान। गाय हिन्दुओं के लिए पवित्र और सूअर मुसलमानों के लिए अपवित्र। इस रहस्योघाटन  से दोनों सम्प्रदाय के सिपाही भड़क उठे।
 इस कारतूस का इस्तेमाल करना  दोनों ही सम्प्रदाय के लिए धार्मिक भावनाओ को आहत और धर्म भ्रष्ट करने जैसा था।

भीतर ही भीतर अंग्रेजों के विरुध्द विद्रोह की चिंगारी सुलग उठी -हिन्दुओ में भी और मुसलमानों में भी।

मनुष्य शारीरिक कष्ट तो सहन कर सकता है, लेकिन कोई उसकी धर्म की पवित्रता को कलुषित करें ,यह कोई भी धर्म परायण बर्दाश्त नहीं कर सकता . मंगल पांडेय भी कैसे बर्दाश्त कर सकते थे....  -कट्टर ब्राह्मण जो थे।

यह वह दौर था जब ईसाई मिशनरी भारत में धर्मान्तरण कर रही थी।

कहा जाता है कि धर्म भ्रष्ट करने के उद्देश्य से ही चर्बी वाले कारतूस दिए गए थे।

एक दिन  जब नेटिव इन्फेंट्री के सैनिकों को चर्बी वाले कारतूस का प्रयोग कैसे करना है ,इसका प्रशिक्षण दिया जा रहा  था,मंगल पांडेय ने विरोध प्रकट करते हुए कारतूस का प्रयोग करने से मना कर दिया। इस पर उन्हें फौजी हुक्म सुनाया गया -वर्दी उतारने और रायफल लौटने का

 २९ मार्च ,१ ८५७ -
मंगल पांडेय के भीतर सुलग रहा ज्वाला मुखी  फूट पड़ा  -
गुस्साये मंगल पांडेय ने मैदान के बीच खड़े होकर अपने साथियों को विद्रोह के लिए पुकारा , लेकिन भय के कारण कोई साथी साथ न आया ,
सामने आये दो अंग्रेज अफसर -मि.बाफ और मि. ह्यूसन।
मंगल पांडेय ने दोनों अंग्रेज अफसरो को मौत के घाट उतर दिया।
ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर ऐसा माना  जाता है कि मंगल पांडेय ने खुद को गोली मारकर  जीवन लीला समाप्त करने  का प्रयास किया था ,किन्तु  ऐसा न हुआ।
कहा जाता है कि एक अन्य अफसर हियर्सी ने आस-पास जमा सिपाहियों में से किसी एक सिपाही को मंगल पांडेय को पकड़ने का आदेश दिया, लेकिन थोड़ी देर के लिए वह सिपाही भी गूँगा -बहरा बन गया।बताया जाता है कि  आदेश न मानने के आरोप में इस सिपाही को भी फाँसी दे दी गयी थी।
मंगल पांडेय को गिरफ्तार कर कोर्ट मार्शल किया गया
६ अप्रैल को फांसी की सजा सुनाई गयी -फांसी दी जाने की तारीख तय हुई थी - १८ अप्रैल
मंगल पांडेय को फांसी दिए जाने के फैसले के बाद सैनिक छावनियों में ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुध्द विद्रोह की आवाज़ आने लगी थी।
किसी बड़े खतरे की आशंका से ८ अप्रैल को ही मंगल पांडेय को फांसी पर लटका दिया गया।
कहा जाता है कि जिन जल्लादों को फांसी  देने का हुक्म दिया गया था ,उन्होंने  मगल पांडेय को अपने हाथों से फांसी देने से इंकार कर दिया था। मंगल पांडेय को फांसी देने के लिए कलकत्ता से जल्लाद बुलाये गए थे।

मंगल पांडेय की शहादत ने सूखी घास में चिंगारी डालने का काम किया।
१० मई १८५७  को मेरठ छावनी में हुए सैनिक विद्रोह का होना इस बात का प्रमाण है कि  मंगल पांडेय की शहादत ही ज्वाला बनाकर भड़की थी।

 प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत क्रान्ति वीर  मंगल पांडेय को   उनके जन्मदिन पर शत-शत नमन।