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Thursday, July 6, 2017

guru poornima in hindi

गुरु पूर्णिमा


ॐ सह नाववतु
सह नौ भुनक्तु
सह वीर्यं करवावहै
तेजस्विनावधीतमस्तु
मा विद्विषावहै
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति :



हे प्रभु ,हम गुरु -शिष्य की रक्षा कीजिये। आनंद का पान कराइये। हमारा ज्ञान राष्ट्र हित  में हो। हम द्वेष  .. विरोध न करें  .. अत्यंत प्रेम से अध्ययन -अध्यापन करें -कराये  ... हमें आध्यात्मिक ,आधि भौतिक ,आधि दैविक शांति प्राप्त हो  ...
ऐसी पवित्र प्रार्थना का दिन है  -गुरु  पूर्णिमा 

शिष्य द्वारा अपने श्री गुरु के प्रति श्रध्दा ,सम्मान और समर्पण अर्पित कर कृतज्ञता प्रकट करने का दिन है आज है .
गुरु पूर्णिमा ,जो आषाढ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार चतुर्वेद और महाभारत जैसे धर्म ग्रंथों के प्रणीता आदि गुरु माने जाने वाले कृष्ण द्वैपायन व्यासजी का आविर्भाव इसी दिन हुआ था .



गु अर्थात अन्धकार रु अर्थात प्रकाश ,इस तरह देखा जाये तो गुरु वह है,जो मनुष्य को अज्ञानता के अन्धकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाये .अज्ञान का नाश करनेवाला प्रकाश ब्रह्म गुरु ही है ,इसमें संशय नहीं है। 
स्कन्द पुराण के उत्तर खंड में भगवान शिव ने माता पार्वती के समक्ष गुरु महिमा की महत्ता का अत्यंत विस्तार से प्रतिपादन किया है .भगवान शिव कहते है कि-
गुरु ,ब्रह्म और ज्ञान स्वरुप आत्मा से भिन्न नहीं है .यह सत्य है ,इसमे लेशमात्र भी संशय नहीं .श्री गुरु की सेवा से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है .श्री गुरु सेवा से सर्व तीर्थ स्नान का पुण्य प्राप्त हो जाता है .अज्ञान को जड़ से उखाड़ने और जन्म-कर्म का निस्तारण का सामर्थ्य गुरु सेवा से ही प्राप्त हो सकता है .श्री गुरु का निवास काशी है , तो उनका चरणोदक गंगा है .श्री गुरु साक्षात् विश्वेश्वर और तारक ब्रह्म है .वे अक्षय वट है ,तीर्थराज प्रयाग है .श्री गुरु का इस प्रकार स्मरण करना चाहिए ,जैसे कोई कुलीन स्त्री अपने स्वामी का स्मरण करती है .सत्य ज्ञान की प्राप्ति गुरु कृपा से ही  प्राप्त होती है .गु का अर्थ अन्धकार है और रु का अर्थ प्रकाश अर्थात गुरु ही अज्ञानता रुपी अन्धकार को मिटाकर ज्ञान रुपी अलोक से आलोकित करता है . गुरु पद देवताओं के लिए भी दुर्लभ है .शिष्य को चाहिए कि कर्म ,मन और वाणी से गुरु आराधना करें .उसे सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए .
मै स्वयं ऐसे गुरु को नमस्कार करता हूँ जो संसार रुपी वृक्ष पर आरूढ़ होकर नरक रुपी समुन्द्र में गिरते हुए प्राणियों का उध्दार करता है .जो ब्रह्मा , विष्णु , शिव , परब्रह्म के सम तुल्य  है. जो  संसार सागर को पार करने लिए सेतु रूप है . जो माता,पिता और इष्ट तुल्य है .जिसके अस्तित्व से संसार का अस्तित्व है .
शिव के रुष्ट होने पर गुरु रक्षण करने वाले है किन्तु गुरु के रुष्ट होने पर शिव भी रक्षण नहीं कर सकते .जिस दिशा में श्री गुरु के चरण विराजते है ,उस दिशा में भक्तिपूर्वक नमस्कार करना चाहिए .
श्री गुरु के स्वरुप का चिन्तन शिव स्वरुप के चिन्तन और गुरुमंत्र का जाप शिव जाप के सम तुल्य है .श्री गुरु से बढ़कर कोई तत्व नहीं ,गुरु सेवा से बढकर कोई तप नहीं , ध्यान ,पूजा ,मन्त्र और मोक्ष का मूल गुरु ही है .गुरु से परे और श्रेष्ठ कुछ नहीं .
देव ,गन्धर्व ,किन्नर ,पितर,यक्ष,ऋषि और सिध्दि भी गुरु सेवा से परामुख हो तो ,वे भी कभी मुक्त नहीं हो सकते .श्री गुरु का ध्यान आनंद ,सुख ,भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है .
गुरु से अधिक कुछ नहीं है  .... कुछ नहीं है .... कुछ नहीं है
गुरु तत्व ही कल्याणकारी है  .... गुरु तत्व ही कल्याणकारी है  ....गुरु तत्व ही कल्याणकारी है
शिष्य को गुरु के बताए मार्ग से मन की शुध्दि करनी चाहिए .गुरु से कभी परा मुख नहीं होना चाहिए .गुरु की निंदा करनेवाला तब तक नरक भोगेगा ,जब तक सूर्य –चन्द्र रहेगे . गुरु का सम्मान ना करनेवाला निर्जल अरण्य में ब्रह्म राक्षस के समान है .गुरु सेवा से वंचित को अभागा मानना चाहिए .
सच्चे गुरु भक्त से माता-पिता ,कुल –वंश और पृथ्वी भी स्वयं को धन्य मानती है .
गुरुजनों की सेवा करने से स्वर्ग ,धन -धान्य ,विद्या ,पुत्र ,सुख आदि कुछ भी दुर्लभ नहीं है। वेद के अनुसार गुरु के अनुसार गुरु से बढ़कर वंदनीय और पूजनीय अन्य कोई नहीं है. 
श्रीमद्भगवद गीता में कहा है-गुरु वह है जो ज्ञान दे और ब्रह्म की ओर ले जाये। 


गुरु गोविन्द दौउ खड़े काके लागु पाय
बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दियो बताये
गुरु की महिमा को अवर्चनीय और अवर्णित बताते हुए कबीर कहते है कि-
सब धरती कागद करूँ , लेखनी सब  बनराय
सात समुंदर मसि करु ,गुरु गुण लिखा ना जाए
सच्चा गुरु दुर्लभ है ,जिसे मिल जाए वह सौभाग्यशाली है –
यह तन विष की बेलरी ,गुरु अमृत की खान
शीश दिए जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान
हरि रूठ जाये तो गुरु शरण है ;किन्तु गुरु के रूठने पर उसकी रक्षा देवता भी नहीं कर सकते ,स्कन्द पुराण में भगवान शिव के इस कथन की  कबीर ने भी पुनरावृत्ति करते हुए कहा है -
कबीरा ते नर अंध है  ,गुरु को कहते  और  
हरि रूठे गुरु ठौर है ,गुरु रूठे नहि ठौर 
चाणक्य ने गुरु निंदा तो क्या ,गुरु की निंदा  सुनने को भी पाप बतलाया है।
तुलसीदासजी ने गुरु स्तुति करते हुए लिखा है -
बंदऊ  गुरु पद कंज ,कृपा सिंधु नर रूप हरि 
माया  मोह तम पुंज ,जासु वचन रविकर  निकर   

तुलसीदासजी ने गुरु के सम्बन्ध में कहा है -
गुरु बिन भव निधि तराई  न कोई 
जो बिरंचि संकर सम   होई 
अर्थात संसाररूपी सागर को कोई अपने आप तर नहीं सकता। चाहे वः ब्रह्माजी जैसा सृष्टि कर्ता हो या संहार कर्ता शिव हो। अपने मन की चाल से अपनी मान्यताओं के जंगल से निकलने के लिए पग डंडी दिखानेवाले सद्गुरु अवश्य चाहिए। 
करता करें ना कर सकें ,गुरु करें सब होय 
सात द्वीप नौ खंड में गुरु से बड़ा न कोय 

चाणक्य और चंद्र गुप्त ,समर्थ गुरु रामदास और शिवजी तथा  राम कृष्ण परम हंस और स्वामी विवेकानन्द उदहारण है। 
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गुरु 
वर्तमान में वैश्विक व्यवसायीकरण ने गुरु धर्म को भी व्यवसाय बना दिया है।आध्यात्मिक ज्ञान के स्थान पर शारीरिक मानसिक घरेलू परेशानियाँ दूर करने या भौतिक सुख प्रदान अथवा आकस्मिक धन लाभ का प्रलोभन देने वाले तांत्रिक गुरु बन बैठे है। ऐसे तथाकथित -छद्म गुरुओं ने  गुरु प्रतिष्ठा को न सिर्फ क्षति पहुँचाई है बल्कि गुरु के प्रति आस्था और विश्वास की जड़ों को कमज़ोर किया है।समय-समय पर टीवी न्यूज़ चैनल ,समाचार पत्र और सोशल मिडिया पर वायरल होनेवाले प्रकरण इस तथ्य की पुष्टि करते है । व्यक्तिगत हित साधने वाले ऐसे गुरु -शिष्य जहाँ एक ओर पवित्र भावना को कलुषित कर रहे है ,वही दूसरी ओर गुरु के प्रति की युगों से चली आ रही आस्था ,विश्वास और समर्पण की भावना को भी कलंकित कर रहे है। 
गुरु लोभी शिष्य लालची ,दोनों खेले दॉव 
दोनों बूडे बापूरे ,चढ  पाथर की नाव 
यदि गुरु शिष्य अपना -अपना हित साधनेवाले हुए तो पत्थर की नाव में बैठ कर नदी पार करने जैसी मूर्खता होगी। 
जाका गुरु भी अंधला ,चेला खरा निरन्ध 
अंधे ,अँधा ठेलिया ,दोनों कूप पड़ंत 
ऐसा गुरु न अपने शिष्य का कल्याण कर सकता है और न ऐसा शिष्य अपने गुरु का लाभ उठा सकता है। 
एक ओर गुरु ऐसे शिष्य को तलाश रहा है जो आर्थिक लाभ दे सकें और शिष्य ऐसे गुरु को तलाश रहा है ,जो आर्थिक लाभ पहुंचा सकें। दूसरी ओर सच्चा गुरु सच्चे शिष्य को तलाश रहा है और सच्चा शिष्य सच्चे गुरु को तलाश रहा है। 
सच्चे गुरु दुर्लभ है। हमें अपने बुध्दि विवेक से सच्चे और छद्म गुरु को पहचानना है।चाणक्य और चंद्र गुप्त, समर्थ गुरु रामदास और शिवजी महाराज  तथा राम कृष्ण परम हंस और स्वामी विवेकानंद जैसे गुरु -शिष्य आज भी है ,बस -पहचानना शेष है । 
 समय जो गतिशील है ,समय जो परिवर्तनशील है ,समय के साथ –साथ बहुत कुछ बदल जाता है .जो परम्पराएँ और मान्यताएँ कभी देश ,समाज और मानव कल्याण का अनिवार्य अंग हुआ करती थी ,उन परम्पराओ  और मान्यताओ में से कुछ  समय के साथ –साथ अप्रासंगिक होती चली गई और कुछ विलुप्त प्राय-सी हो गई .जो परम्पराएँ और मान्यताएँ कभी हुआ करती थी ,लेकिन आज नहीं है.लेकिन उनमे से कुछ परम्पराएँ और मान्यताएँ ऐसी है जो कल भी थी ,आज भी और कल भी रहेंगी.