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Sunday, November 26, 2017

gita jayanti -birthday of srimad bhagawadgita

३० नवम्बर -गीता जयंती 


आत्मिक -निवेदन -अवश्य पढ़े 







वासी -प्रवासी बन्धुओ ,
कोटि -कोटि सादर नमस्ते ......




मार्गशीष मॉस की शुक्ल पक्ष की एकादशी -ब्रह्म पुराण के अनुसार यही वह तिथि है जब कलियुग से पूर्व द्वापर युग में कुरुक्षेत्र में योगेश्वर कृष्ण ने धर्म और कर्तव्य से विमुख हो रहे अर्जुन को तत्व ज्ञान देकर धर्म और कर्तव्य के प्रति उत्प्रेरित किया था। योगेश्वर कृष्ण के श्रीमुख से उद्भासित शब्द ही कृति रूप में श्रीमद्भगवद गीता का स्वरुप है।
श्रीमद्भगवद गीता  स्वाध्याय मोक्ष दायी माना गया है और श्रीमद्भगवद गीता का उदभव भी
 मार्गशीष मॉस की शुक्ल पक्ष की एकादशी को हुआ था ,इसलिए  मार्गशीष मॉस की शुक्ल पक्ष की एकादशी को
मोक्षदा एकादशी भी कहते है। आज ही की तिथि को योगेश्वर कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिए गए उपदेश से श्रीमद्भगवद  गीता  प्रसूत हुई , इसीलिए इस तिथि को गीता जयंती के रूप में मनाया जाता है।
गीता एक धर्म ग्रन्थ ही नहीं बल्कि एक दर्शन है .. पापों का क्षय करने वाला ....परमात्म की विशद व्याख्या करनेवाला ग्रन्थ है। गीता देहधारियों को जहाँ सार्थक ढंग से जीना सिखाती है ,वही सार्थक मृत्यु का मार्ग भी प्रशस्त कराती है।
गीता में अर्जुन की जिज्ञासा और प्रश्न केवल अर्जुन के प्रश्न और जिज्ञासा नहीं वरन हम मनुष्यों के भी प्रश्न और जिज्ञासा है -जिसका समाधान गीता में निहित है।  गीता का श्रवण अथवा वाचन के पश्चात्  वेदों का अध्ययन करने की आवश्यकता नहीं रह जाती ,अन्य शब्दों में कहा जा सकता है कि गीता में चारोँ वेदों का सार समाहित है।    

 




अपने मानव जीवन को सार्थक बनाने  का अभीष्ट  अथवा आत्मिक उत्थान का मनोरथ रखनेवाला   मनुष्य जिस कार्य को अपने मनुष्य जीवन में एक बार आवश्यक  रूप से करना चाहता है ,उनमे से एक है-श्री मद् भगवद गीता का अध्ययन
श्री मद्  भगवद् गीता  भगवान श्री कृष्ण  के श्री मुख से निसृत वह अमृत वाणी है ,जिसका पठन -श्रवण कर मनुष्य अपना जीवन सार्थक बना सकता है। श्री मद् भगवद् गीता महर्षि व्यास द्वारा सृजित महाकाव्य महाभारत के भीष्म पर्व में संकलित है। श्री मद् भगवद् गीता प्राचीन-काल से वर्तमान तक संसार को जीवन सत्य से अवगत कराती आ रही है। 
आध्यात्मिक क्षेत्र में श्री मद् भगवद गीता देदीप्यमान नक्षत्र के सदृश है। इसमें समाहित अतुलित ज्ञान का तेज कोटि सूर्य के समान है ,वही अज्ञानता की रात्रि में सोये हुए मनुष्यों के लिए अनन्त तारों के मध्य चन्द्रमा की भाँति ज्ञान रश्मिओ की अमृतमय वर्षा करने वाला है। 
श्री मद् भगवद गीता की महिमा का बखान करने का सामर्थ्य किसी में नहीं। बड़े-बड़े ऋषिओं -मुनिओं ने श्री मद् भगवद गीता की महत्ता प्रतिपादित की है ,किन्तु हर बार समस्त वर्णनों को मिलाकर  भी इसकी महिमा में कहीं न कहीं कमी रह ही जाती है। 
जैसे जीने के लिए हवा,पानी,भोजन आवश्यक है ,वैसे ही सार्थक जीवन जीने के लिए श्री मद् भगवद गीता का अध्ययन  आवश्यक है। 
विभिन्न सम्प्रदाय के धर्म गुरुओं ने श्री मद् भगवद गीता को  जन-जन तक पहुँचाने का भरपूर प्रयास किया और कर रहे है।ईश -वत्सल तो इस ज्ञान गंगा में डुबकी लगाकर अपना मनुष्य जीवन सार्थक कर चुके है ,किन्तु खेद है कि आज भी कई सारे मनुष्य श्री मद् भगवद गीता के ज्ञानामृत से वंचित है। वे भी इस ज्ञानामृत का पान करना तो चाहते है किन्तु आधुनिक जीवन शैली ,वैयक्तिक उत्तर दायित्वों ,जीविकोपार्जन की जद्दो -जहद और व्यक्तिगत समस्याओं के कारण चाहकर भी श्री मद् भगवद गीता का अध्ययन नहीं कर पा रहे है। उसके दो प्रमुख कारण है 

पहला -समयाभाव  और दूसरा  इसके वृहदाकार के साथ- साथ भाष्यकारों द्वारा प्रयुक्त अत्यधिक साहित्यिक ,क्लिष्ट अलंकृत और जटिल -कठिन  दार्शनिक भाषा का प्रयोग। 
मेरे कई ऐसे मित्र ,परिचित और पारिवारिक सम्बन्धी है जिनके घरों में श्री मद् भगवद गीता ग्रन्थ तो है ,किन्तु 
उपर्युक्त कारणों से थोड़ा -बहुत अध्ययन कर आगे पढ़ना छोड़ दिया। 
उपर्युक्त दोनों कारणों को ध्यान में रखकर मैंने जन-सामान्य की समझ में आने वाली  सीधी -सरल भाषा में संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करने का  निश्चय किया ताकि मेरे समस्त स्वजन  श्री मद् भगवद गीता का समग्र न सही ,आंशिक लाभ उठा सके ,इसके लिए  श्री मद् भगवद गीता का(अध्याय एक से अठारह तक)एक-एक अध्याय पृथक - पृथक प्रकाशित (post )किया है  । यह ना कोई व्याख्या है,ना टीका और ना विद्वता या पांडित्य प्रदर्शन। सिर्फ उपलब्ध टीकाओं की सरल-सहज  अभिव्यक्ति है।  मेरे स्वजन अपने व्यस्त समय में से सिर्फ और सिर्फ दस मिनट निकालकर श्री मद् भगवद गीता  के अध्ययन का पुण्य अर्जित कर सकेंगे। 
मेरा अपने समस्त वासी-प्रवासी  भाइयों से करबद्ध निवेदन है कि स्वयं भी इस पोस्ट को पढ़े और अपने से जुड़े आत्मीय जनो को पढ़ने के लिए प्रेरित करे। 
पूर्व प्रकाशित  पोस्ट में आप श्री मद् भगवद् गीता के एक से अठारह  अध्याय देख सकेंगे। 
जय श्री कृष्ण   
आपका प्रोत्सानाकांक्षी ,

Monday, October 30, 2017

lauh purush-sardar vallabh bhai patel

सरदार वल्लभ भाई पटेल
31 अक्टूबर 
जन्म  -तिथि


३१ अक्टूबर  भारतीय कलेंडर की वह तारीख जो बरबस ही उस महान राष्ट्र -भक्त का स्मरण करा देती है ,जिसे हर भारतवासी लौह पुरुष और IRON  MAN OF INDIA  के नाम से जनता है। आज उसी राष्ट्र -भक्त की जन्म  तिथि है ,आज ही के दिन यानि ३१ अक्टूबर  को भारत को एकीकृत राष्ट्र के रूप में स्थापित करने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल का भारत भूमि पर अवतरण हुआ था ,जिन्होंने  स्वतन्त्रता  के पश्चात् देश की ५६२ रियासतों का भारत में विलय किया था।

महापुरुषों की जन्म/पुण्य तिथियाँ हमें अतीत में ले जाती है और अतीत एल्बम की तरह उन यादों को दोहराने लगता है ,जो हमारे  स्मृतिपटल पर धुंधली  पड़ जाती है।  आज ३१ अक्टूबर  की तारीख सरदार पटेल की यादों को फिर से हमारी स्मृति में ताज़ा कर रही है-जिसके इरादें फौलाद की तरह ही मज़बूत थे। सरदार पटेल को पहचान मिली -खेड़ा आंदोलन से,जब गुजरात का खेड़ा क्षेत्र भयंकर दुर्भिक्ष से जूझ रहा था ,वहा का किसान लगान देने की  स्तिथि में नहीं था। वहा के  किसानों ने अंग्रेजी सरकार से  रियायत  देने की गुहार लगाई  लेकिन अंग्रेजी सरकार   के कान पर जू तक न रेंगी ,तब सरदार पटेल के नेतृत्व में अंग्रेजी सरकार  खिलाफ प्रदर्शन किया गया ,परिणाम स्वरुप अंग्रेजी सरकार को किसानों की मांग स्वीकार करने के लिए बाध्य होना पड़ा। इसके बाद हुए बारडोली के सत्याग्रह ने वल्लभ भाई  को और कई  ज्यादा  लोकप्रिय बना दिया ,उन्हें सरदार  कहा जाने लगा। इस तरह  अब सरदार वल्लभ भाई पटेल के रूप  में पहचाने जाने लगे।

सच्चा अहिंसक वही है जो तलवार चलना जानते हुए भी तलवार म्यान में रखता है -सरदार पटेल 

सरदार  पटेल ने अपनी  राजनीति कुशलता से गांधीजी को प्रभावित  अवश्य किया किन्तु गांधीजी का नेहरू  प्रेम जग ज़ाहिर है। यहाँ गांधीजी धृष्टराष्ट्र मोह के कारण सरदार पटेल के साथ पक्ष पात कर गए। स्वतन्त्रता  प्राप्ति के पश्चात् प्रधान -मंत्री पद के लिए यदि कोई योग्य दावेदार था तो वे थे -सरदार पटेल। यदि किसी  बुद्धिमान को एक श्रेष्ठ और दूसरा उससे ज्यादा श्रेष्ठ में  से किसी एक को चुनना पड़े तो ,वह ज्यादा श्रेष्ठ  को ही चुनेगा किन्तु गांधीजी ने व्यक्तिगत प्रेम के कारण ज्यादा श्रेष्ठ सरदार पटेल के स्थान पर श्रेष्ठ नेहरू को प्रधान मंत्री के रूप में चुना। गांधीजी नेहरूजी को प्रधान -मंत्री बनाना चाहते थे , कहना गलत न  होगा कि यह फैसला योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि व्यक्तिगत सम्बन्धों के आधार पर लिया गया था। यदि सरदार पटेल   देश के पहले प्रधान -मंत्री बने होते तो पाकिस्तान ,चीन और कश्मीर का जो   मुद्दा आज देश के लिए सिरदर्द बना हुआ है ,वह शायद इस स्तिथि में ना होता जिस स्तिथि में आज है, क्योकि इस तरह के मामलों में फैसले लेने की जो दक्षता सरदार पटेल में थी वह नेहरूजी में न थी। उदार होना अच्छा है किन्तु हर अच्छी बात  ,हर जगह अच्छी नहीं होती ,विशेषरूप से राजनीति में। राजनीति  में हर जगह उदारता का ढोल बजाना अकलमंदी नहीं कहा जा सकता ,कुछ फैसले सख्ती से लेने पड़ते है और सरदार पटेल इस तरह के फैसले में पटु थे।

कायर अतीत का रोना रोते  रहते है ,जबकि वीर अतीत से सबक लेकर मुकाबले की तैयारी करते है -सरदार पटेल 
स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् सरदार पटेल  को उप प्रधान मंत्री और गृह मंत्री का दायित्व सौपा गया। स्वतन्त्रता  पूर्व भारत छोटी -बड़ी रियासतों में विभाजित था। गृह मंत्री के रूप में सरदार पटेल के सामने चुनौती थी -५६२ रियासतों का एकीकरण करने की ,बहुत बड़ी चुनौती। सरदार पटेल ने इस चुनौती को स्वीकारा  ही नहीं बल्कि
कुशलता पूर्वक यथार्थ रूप में तात्कालिक रियासतों का भारत में विलय कर दिखाया। वर्तमान में भारत जिस रूप में दिखाई दे रहा है वह सरदार पटेल के बुद्धि चातुर्य का ही प्रमाण है। हाँ, हैदराबाद , जूनागढ़ और कश्मीर के
मामलों में थोड़ी परेशानी ज़रूर आयी किन्तु बाद में  हैदराबाद और जूनागढ़ का भी विलय कर लिया गया और यदि कश्मीर मामले  नेहरूजी  ने हस्तक्षेप ना किया होता तो शायद कश्मीर मुद्दा भी बहुत हद तक सुलझ चुका  होता।

प्राण लेने का अधिकार तो ईश्वर का है ,सरकार की तोपे और बंदूकें हमारा कुछ नहीं बिगड़ सकती। हमारी निर्भयता ही हमारा कवच है -सरदार पटेल 
सरदार पटेल ने इतनी बड़ी क्रांति को जिस  दृढता से  बिना रक्त की एक बूँद बहाये सम्पन्न   कर दिखाया ,निस्संदेह यह महा पुरुष भारत का बिस्मार्क कहलाने का अधिकारी है और यदि उन्हें भारतीय राजनीति  का चाणक्य भी कहा जाये तो अतिशयोक्ति ना होगी।

ऐसे कर्मयोगी को उनकी जन्म  -तिथि पर  हम भारतीय कोटि -कोटि श्रद्धा सुमन अर्पित  करते है। 

Friday, October 20, 2017

bhai dooj -yam dwitiya kyon manate hai




  भाई दूज एवं यम द्वितीया 



दीपावली का पञ्च दिवसीय पर्व का पांचवा पर्व है –भाई दूज .इसे यम द्वितीया के रूप में भी मनाया जाता है .भारतीय संस्कृति में जितने भी प्रचलित  त्यौहार ,उत्सव अथवा पर्व है ,उसकी पृष्ठभूमि में एक उद्देश्य भी निहित होता है। यदि हम इसकी परतों को खोलकर देखे तो ज्ञात होगा की हमारे ऋषि-मुनि ,मनीषी कितने बड़े मनोवैज्ञानिक विश्लेषक थे। युगों व्यतीत हो जानेपर  भी इन प्रचलित  त्यौहार ,उत्सव अथवा पर्व की अद्यतन  प्रासंगिकता ज्यो कि त्यों बनी हुई है। 
भाई दूज मनाने के साथ भविष्य पुराण में वर्णित  जो पौराणिक कथा जुडी हुई है ,उसे आधुनिक सन्दर्भ से जोड़कर देखे तो तथाकथित बुध्दिवादी -आधुनिकवादियों को इन त्योहारों की महत्ता स्वत:समझ में आ सकती है ,बस आवश्यकता है, बुध्दि का चश्मा उतारकर भावना का चश्मा चढ़ाने   की।    
.मान्यता के अनुसार सूर्यदेव की अपनी पत्नी संज्ञा से दो संताने उत्पन्न हुई  –एक पुत्र और दूसरी पुत्री .पुत्र का नाम यम और पुत्री का नाम यमी अर्ताथ यमुना .विवाहोपरांत एक बार बहिन के अत्यधिक स्नेहपूर्ण  आग्रह पर यम अपनी बहिन यमी के घर आये .बहिन यमी ने न सिर्फ आत्मिक स्वागत –सत्कार किया अपितु स्वयं अपने हाथों से बनाया हुआ स्वादु भोज भी  कराया .भोजनोपरांत बहिन ने भाई यम के माथे पर तिलक किया .भाई यम ने अपनी बहिन के आदर  -सत्कार से प्रसन्न होकर वर माँगने का आग्रह किया .तब बहिन यमी ने अपने भाई यम से कहा कि जो बहिन आज की तिथि को अपने भाई को भोजन करा कर तिलक करे ,उस बहिन की रक्षा हो,उसे भय न हो  .भाई ने यम ने अपनी बहिन यमी को तथास्तु कहकर वचनबध्दता  के प्रति आश्वस्त किया .तब से भाई दूज त्यौहार मनाने का प्रारम्भ माना जाता है .वही परम्परा आज भी चली आ रही है .इस दिन भाई अपनी बहिन  के घर भोजन करते है तथा बहिन भाई के माथे पर तिलक करती है तथा भाई की चिरायु होने की प्रार्थना कराती है .मान्यता के अनुसार इस दिन भाई को अपने घर भोजन न कर अपनी बहिन के यहाँ ही  भोजन करना चाहिए .सहोदरा न होने की स्तिथि में चचेरी बहिन अथवा धर्म बहिन के यहाँ जाकर भी इस परंपरा का निर्वाह किया जा सकता है .
.पद्मपुराण के अनुसार इस दिन नरक भोग रहे जीवो को नारकीय जीवन से मुक्ति मिली थी .इस दिन को उत्सव के रूप में मनाया गया . इसीलिए इस तिथि को यम द्वितीय के नाम से भी जाना जाता है .
यह पर्व अलग –अलग प्रान्तों में में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है .उत्तर भरत के मध्य प्रदेश ,राजस्थान ,उत्तर प्रदेश  तथा बंगाल में भाई दूज के नाम से तो गुजरात में बाई बीज तथा महाराष्ट्र में माई बीज  नाम से मनाया जाता है .


पौराणिक मान्यता जो भी रही हो ,लेकिन इतना तो सच है कि इन त्योहारों के माध्यम से हमारे 
ऋषियों – मुनियों ने जो मान्यता प्रचलित की,उन 

सब के पीछे कोई न कोई मनोवैज्ञानिक  कारण अवश्य जुड़ा हुआ है विवाहोपरांत भाई –बहिन के सम्बन्धो में भौगोलिक दूरियां आ जाती है ,अपने –अपने घर गृहस्थी के उत्तर दायित्वों में व्यस्त हो जाते है ,भाई/भाइयों  को यह याद रहे मेरी अपनी भी बहिन /बहिने है ,जिसके प्रति उसका  दायित्व है ,इसी भांति बहिन को भी अपने पारिवारिक दायित्वों के बीच भाई का स्मरण रहे .शायद रक्षा –बंधन और भाई दूज जैसे त्योहारों को प्रचलन में लाने का हमारे ऋषियों –मुनियों का मनोवैज्ञानिक यही उद्देश्य रहा हो . इन त्योहारों के बहाने भाई-बहिन के रिश्ते अटूट बने रहे .यह मनोवैज्ञानिक सच भी है कि  मनुष्य जिससे लम्बे समय तक दूर रहता है ,वे समय के साथ –साथ विस्मृत होती चली जाती है ,आत्मिक लगाव कम हो जाता है .इस तरह के त्योहारों के बहाने दूर  रह रहे भाई-बहिन को परस्पर मिलने का अवसर प्राप्त तो होता ही है ,साथ आत्मीयता भी बनी रहती है .बच्चों में रिश्तों के प्रति समझ बढ़ती है ,बच्चे भी समझने लगते है कि यह मेरे मामा है और यह मेरी बुआ है . रक्षा बंधन के दिन बहिन भाई के घर आती है तो भाई दूज के दिन भाई बहिन के घर आता है .कल्पना करके देख लीजिये ,यदि इस तरह के भाई –बहिन के त्यौहार न होते तो भाई –बहिन क्या साल में दो बार मिल सकते थे ? काम की अधिकता या अत्यधिक व्यस्तता के कारण मनुष्य अपनी पत्नी ,बच्चों और माता-पिता के लिए समय नहीं निकल पता तो दूर रह रही बहिन के लिए कैसे समय निकल पाता ?
कोई अपने को चाहे जितना बुध्दिवादी -आधुनिकवादी समझे किन्तु वह बुध्दि के शिखर से उतर कर भावना के धरातल पर उतर कर देखे तो वह भी अनुभव करेगा ,स्वीकार करेगा कि भारतीय त्योहारों को मानाने की भी अपनी महत्ता है ,सार्थकता है । बहाना ही सही ,लेकिन बहाना अच्छा है। 

Friday, September 29, 2017

ravan still alive


रावण अभी ज़िंदा है 













जिस दिन पाप का घड़ा भर जाता है ,उस दिन फूट  भी जाता है ,यह बात तब भी सत्य थी और आज भी उतनी ही सत्य है -बापू आशाराम ,रामपाल और राम रहीम ,इसके उदाहरण है। रावण ने भी साधु वेश में ही छल किया था और ये  तीनों  भी साधु वेश में दुष्कर्म करते रहे । क्या ऐसे लोग किसी रावण से कम है ?
रावण आज भी ज़िन्दा है -बापू आशाराम ,रामपाल और राम रहीम  जैसे छद्म साधु संतों के रूप में 
पौराणिक काल से लेकर इतिहास तक और इतिहास से लेकर आज तक नारी और उसकी अस्मिता के हरण के ना मालूम कितने प्रकरण हुए ,फिर रावण ही सबसे बड़ा दोषी क्यों ?
तो इसका उत्तर यह कि भारत के  छद्म साधु-संतों को यह IDEA  देने वाला रावण ही था। रावण ने माता सीता का बाहुबली बनकर नहीं ,साधु वेश में किया था। माता सीता ने साधु पर विश्वास किया था और छली गई ।   रावण  ही इस IDEA   का FATHER था ,जिसने सारे बुरे लोगों को यह सिखाया कि विश्वास को धोखा देकर हर उस चीज को पाया जा सकता है ,जो तुम अपने लिए चाहते हो। बापू आशाराम ,रामपाल और राम रहीम का गुरु और कोई नहीं रावण ही था। गुरु रावण गुड़ ही रह गए और चेले शक्कर बन गए  .... गुरु रावण से भी दो कदम आगे निकल गए। रावण ने सिर्फ देह का हरण किया ,शील का नहीं। इतनी मर्यादा और गरिमा रावण के अपराध में रियायत बन सकती है,किंतु बापू आशाराम ,रामपाल और राम रहीम ने तो इस शर्म को भी तार- तार कर दिया।बापू आशाराम ,रामपाल और राम रहीम ने रावण को अपना गुरु तो मान लिया किन्तु अपने गुरु की गलती से सीख नहीं ली। तीनों यह क्यों भूल गए कि  नारी के प्रति कामासक्ति  का भाव ही उनके गुरु  के पतन का कारण बना। इन तीनों ने भी अपने गुरु की गलती को दुहराया और अब जेल की हवा खा रहे है।
दुनिया के उन लोगों को सावधान हो जाना चाहिए जो नारी के प्रति दुर्भावना रखते है ,देर-सवेर उनका भी यही हश्र होगा।

दशहरा सिर्फ रावण के पुतले को जला देने भर का त्यौहार नहीं है ,बल्कि हर मनुष्य के लिए चिंतन का दिन है ,विचार करने का दिन है । रावण,जो बल ,विद्या और बुध्दि से सम्पन्न था ,फिर  क्यों दुश्चरित्र कहलाया ?रावण तो शक्तिशाली था ,विशाल सेना थी उसके पास  .... एक से बढ़कर एक योध्दा थे उसकी सेना में  .... फिर क्यों क्यों एक वनवासी के हाथों पराजित हुआ वह ? राम और रावण की शक्तियाँ  सामान थी ,फिर क्यों राम पूजनीय बन गए और रावण तिरस्कृत और घृणा का पात्र बना ?
उत्तर स्पष्ट है - कोई भी कितना ही भुज बल से संपन्न हो  ... अथवा बुध्दि बल से ,यदि प्राप्त शक्तियों का उपयोग गलत किया तो परिणाम निश्चित रूप से बुरा ही होगा।
मैंने कहा न ,आप दशहरे को एक त्यौहार के रूप में नहीं ,चिंतन के रूप में देखें  ... इसके बाह्य रूप को नहीं ,आतंरिक स्वरुप को देखें  ... इसे सतह से नहीं ,गहराई से देखें ....रावण को किसी राम ने नहीं ,स्वयं रावण ने अपने आप को मारा ,रावण को मारा उसकी ही काम वासना ने ..रावण को मारा उसके क्रोध ने ....  रावण को मारा उसके अपने अहंकार ने  ...  लोभ ने ...  .मोह  ने    ... उसकी हिंसक  प्रवृति ने    ... उसके झूठ और चोरी की प्रवृति  ने  ... कहा जाता है कि रावण के दस के चेहरे थे ,जी नहीं -काम ,क्रोध ,लोभ ,मोह ,अहंकार ,स्वार्थ ,अन्याय ,वासना और विश्वासघात  ये दुष्प्रवृतियाँ ही रावण के दस चहरे है।
हम में से हर वो आदमी रावण है जिसका अन्तकरण  काम वासना  .. क्रोध   अहंकार   ...  लोभ  ...  .मोह      ... हिंसक  प्रवृति     ...  झूठ और चोरी की प्रवृति  जैसी से भरा है .. इन प्रवृतियों से भरे हर उस आदमी का अंत रावण की तरह होगा। ... इन दुष्प्रवृतियों से भरे लोग एक बार नहीं ,बार -बार मरेंगे  .... हर साल मरेंगे और शायद तब तक मरते रहेंगे ,जब तक दुनिया रहेगी।
रावण का अंत सीख है हम सब के लिए भी  ... अन्यायी और अधर्मी का विनाश निश्चित है। जान ले  ,हम चाहे जितने बाहुबली हो अहंकार हमारे पतन का कारण बन सकता है। मोह को त्यागे अन्यथा यह हमे अनुचित और धर्म विरुध्द कार्य करने के लिए विवश कर देगा। लोभ ,हमे हमारे पास उपलब्ध साधनो  के सुख से भी वंचित कर देगा। क्रोध की अग्नि जलाकर राख  कर देगी। स्व के लिए नहीं ,परमार्थ के लिए भी जिए। अन्याय करके दूसरो  से  कभी सम्मान नहीं पाया जा सकता। वासना पर नियंत्रण हमारे चरित्र की पवित्रता को और भी निखार सकता है।

यह गंभीरता से सोचने का विषय है कि वनवासी राम के पास न तो विशाल सेना थी और न हथियार ,फिर भी
महाप्रतापी ,महावीर , बाहुबली माने जानेवाले रावण को राम ने कैसे परास्त किया ? क्या था उनके पास -?
सेना के नाम पर बन्दर और भालू और हथियार के नाम पर पेड़ और पत्थर ,फिर भी विजय प्राप्त की।
राम की शक्ति थी -उनकी साधना।
राम ने प्रमाणित किया कि साधन से ज्यादा महत्वपूर्ण है -साधना। दृढ इच्छा से विपरीत से विपरीत और विषम से विषम  स्थितियों को अनुकूल बनाया जा सकता है।
राम का जीवन प्रेरणा है हम सब के लिये -जीवन में आनेवाले संघर्ष मनुष्य को कमज़ोर नहीं ,बल्कि पहले से ज्यादा ताक़तवर बनाते है। यदि हमारी लड़ाई सत्य के लिए है ,तो विजय मिलना निश्चित है।
सफलता के लिए साधना आवश्यक है। भगवान श्री राम द्वारा माँ दुर्गा की साधना इस बात का प्रतीक है।


दशहरे के त्यौहार की एक बात और  मतहत्वपूर्ण यह है कि इसी दिन माँ  दुर्गा ने   महिषासुर का वध किया था और इसी दिन भगवान श्री राम ने रावण का वध किया था।  माँ दुर्गा को भी महिषासुर को मारने में नौ दिन लगे थे और राम को भी  नौ दिन तक युध्द करने के पश्चात् ही विजय प्राप्त हुई थी। इस दोनों घटनाओं में जो COMMON  बात है ,वह यह कि  सफलता एक ही दिन में प्राप्त नहीं होती। सफलता के लिए धैर्य के साथ  निरंतर प्रयास करने होते है ,तब कहीं जाकर सफलता प्राप्त होती है।
इसी दिन शस्त्र की भी पूजा होती है और शास्त्र की भी। तो इसका तात्पर्य हुआ कि  पाप और पापी का अंत यदि शास्त्र से न हो तो शस्त्र से पाप और पापी का अंत धर्म सम्मत हो जाता है।
एक बात और ,शक्ति संचयन के लिए साधना आवश्यक है। भगवान श्री राम को भी शक्ति प्राप्त करने के लिए माँ दुर्गा  की साधना करनी पड़ी थी। यह बात हम मनुष्यों के लिए भी एक सबक है। जीवन में सफलता के लिए साधना आवश्यक है।
साधना को सफल बनाने के लिए त्याग भी करना पड़ता है ,जैसे राम को अपनी साधना पूर्ण करने के लिए माँ दुर्गा के चरणों में चढ़ाया जाने वाला फूल अनायास विलुप्त हो जानेपर भगवान श्री राम को फूल के स्थान पर अपना एक नेत्र चढ़ाने के उद्यत होना पड़ा  था।
हम सब के भीतर  भी राम है ,बस  ,हमे अपने भीतर अन्तर्निहित शक्तियों को पहचानना है। न अन्याय करें और न अन्याय सहे। शक्तियाँ हम सब में भी मौजूद है। बस , तय करना है कि  शक्ति किस दिशा में लगानी है ?रावण की तरह विनाशकारी कामों में या श्री राम की तरह कल्याणकारी कामों में ?
मानव सुर भी है और असुर भी। मानव में  वे शक्तियाँ विद्यमान है  ,जिसे सत्कर्म में लगाकर मानव , मानव से देव(राम ) बन सकता है और दुष्कर्म में लगाकर मानव से दानव (रावण ) - बन सकता है।

स्वयं में और समाज में बदलाव रावण के पुतले को जलाने  से नहीं ,भीतर के बुराई रुपी रावण को मारने से आएगा।आवश्यकता बाहर के रावण को मरने की नहीं ,भीतर के रावण को मारने की है।

Tuesday, September 26, 2017

raja ram mohan ray -in hindi


२७ , सितम्बर -
पुनर्जागरण के प्रेणता -राजा राम मोहन राय की पुण्य तिथि पर विशेष 












(२२,मई १७७२ ,निर्वाण -२७ सितम्बर ,१८८३ )


वैदिक काल में नारी का स्थान भले ही सम्मान जनक रहा हो ,भले ही विदुषी नारियों  के लिए जाना जाता रहा हो ,किन्तु कालांतर का इतिहास स्याह अंधकार से आप्लावित ही रहा। बाद में  नारी की स्थिति बद  से बदतर होती चली गयी और मध्य काल आते -आते पूजनीय कही जाने वाली नारी  को पुरुष के चरणों की दासी और पैरों की जूती बना दिया गया। समाज- पुरुष प्रधान हो गया ,नारी को धर्म की आड़ में परंपरा और रूढ़ियों की ज़ंजीरों में जकड़ दिया गया। पुरुष की नारी के प्रति मानसिकता रूढ़ हो गयी ,और रवैया दोयम दर्जे का हो गया। पुरुष ने नारी को धक्रेल कर हाशिये में ला खड़ा किया। यह कटु सत्य है कि १८ वी सदी तक नारी उपेक्षा ,अपमान और भेदभाव की शिकार होती रही ,उससे उसके सारे अधिकार छीनकर बेबस  ,लाचार और अबला बना दिया।
पुरुष प्रधान समाज का कानून देखिये -पुरुष एक नहीं कई-कई विवाह कर सकता था , किन्तु किसी स्त्री के  पति की मृत्यु हो जाये तो वह दूसरे विवाह की बात तो दूर  ,कल्पना भी नहीं कर सकती थी। उस समय एक विधवा का जीवन कितना दारुण रहा होगा इसकी कल्पना सहज की जा सकती है -विधवा  उसका सिर मुंडवा दिया जाता था ,वह सफ़ेद कपड़ों के अतिरिक्त अन्य रंग का कपड़ा नहीं पहन सकती थी ,वह किसी सामाजिक -मांगलिक उत्सव में सम्मिलित नहीं हो सकती थी ,राह चलती विधवा को देखना अपशकुन माना जाता था। यह  दशा थी उन स्त्रियों की जो सती होने से बच जाती थी अन्यथा  स्त्री को उसके पति की मृत्यु होने पर  सती होना पड़ता था। स्वेच्छा से नहीं तो बलपूर्वक उसे सती  होने के लिए बाध्य किया जाता था। घर से बहार निकलना जिसके लिए निषिध्द था ,शिक्षा ग्रहण करने पर पाबन्दी थी -ऐसा था उस समय का समाज और ऐसी थी नारी की स्थिति।
इस सामाजिक कुप्रथा के खिलाफ पहला  पत्थर फेंकने वाले शख्स का नाम था -राजा राम मोहन राय 
वर्तमान नारी को जो स्वतन्त्रता  और अधिकार प्राप्त है ,उसका सारा श्रेय सिर्फ और सिर्फ राजा राम मोहन राय  को जाता है ,जिसने नारी स्वतन्त्रता और अधिकारों  का सर्वप्रथम उद्घोष किया  ... शंखनाद कर बहरे समाज को जगाया  .... अंधे गतानुगतिकों को सच का आइना दिखलाया  ... सिले हुए होठों को खोला  ... यह वही राजा राम मोहन राय  थे ,जिन्होंने अंगरेजी सरकार को सती प्रथा को प्रतिबंधित करने .. बहु विवाह को वर्जित करने ,विधवा विवाह को वैध ठहराने  के लिए क़ानून बनाने  के  लिए विवश  किया। राजासाहब के प्रयास इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाते है कि तात्कालिक सामाजिक कुरीतियों के विरुध्द उन्हें किसी बाहरी शत्रु से नहीं ,बल्कि अपनों से लड़ना पड़ा। शत्रु से लड़ना आसन है ,लेकिन अपनों से लड़ना कहीं ज्यादा मुश्किल होता है। इसी चुनौती का सामना करना पड़ा था -राजा मोहन राय को। पहले अपने ही घर में अपने रूढ़ि और परम्परावादी पिता का विरोध सहना पड़ा ,जिसके कारण राजा राम मोहन राय को  गृह त्याग भी करना पड़ा।
वाराणसी  रहकर उन्होंने वेद ,उपनिषद और हिन्दू दर्शन का अध्ययन किया। सिर्फ हिन्दू ग्रंथों का ही नहीं बल्कि जैन,बौध्द ,इस्लाम और ईसाई धर्म ग्रंथो का भी अध्ययन किया। इस अध्ययन का उद्देश्य हिन्दू धर्म में आ गए आडम्बर और कुरीतियों को हटाकर उसमे  सभी धर्मों की अच्छी बातों का समावेश करना था।उन पर हिन्दू विरोधी होने का आक्षेप भी लगाया गया ,जबकि वे हिन्दू धर्म के नहीं बल्कि हिन्दू धर्म में आ गई बुराइयों के विरोधी थे।वे एकेश्वरवाद के प्रबल पक्षधर थे।उन्होंने हिन्दू धर्म में आ गए पाखंड का विरोध अवश्य किया क्योकि उनका मानना था कि पवित्र नदी में स्नान करना  ,पीपल को पूजना  ,ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देना मुक्ति का साधन कदापि नहीं हो सकते। स्वयं अंध-विश्वास के अंशेरे में भटके हुए दूसरों को उन्नति का मार्ग कैसे दिखा सकते है ? उनका मानना था कि समाज और समाज के लोग उन्नति के मार्ग पर तभी अग्रसित हो सकते है, जब पहले से चली आ रही मान्यता को अपने तर्क से सत्य को पहचानने का प्रयास करेंगे। जब तक अन्धविश्वास ,रूढ़िवादिता ,धर्मांधता  रहेगी ,समाज में अंधकार  बना रहेगा।  हिन्दू दर्शन की भांति उन्होंने भी ईश्वर के सर्वव्यापी  अस्तित्व को स्वीकारते हुए समस्त चर प्राणियों में ईश्वर के अस्तित्व को मान्यता दी।  सामाजिक और धार्मिक सुधार  के  उद्देश्य से १८१४ में आत्मीय सभा की स्थापना की ,जिसे  बाद में १८२८ में ब्रह्म समाज में परिवर्तित कर दिया गया।
यह राजा राम मोहन राय ही थे ,जिन्होंने लार्ड विलियम बैंटिक को १८२९ में अधिनियम १७ के अंतर्गत सती प्रथा  को प्रतिबंधित करवाया ,इसके अतिरिक्त हिन्दू विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया तथा  बाल विवाह ,बहु विवाह और मूर्ति  पूजा   का सशक्त विरोध किया। वे स्त्री शिक्षा के साथ -साथ पाश्चात्य शिक्षा के भी प्रबल  पक्षधर थे।अज्ञानता के तिमिरांध को ज्ञान के आलोक से मिटाया जा सकता है।  वे  चाहते थे कि नारिओं को भी वही अधिकार प्राप्त होने चाहिए जो पुरुष को प्राप्त है। बनी बनाई   लकीर को मिटाकर नई लकीर खींचना निस्संदेह चुनौती पूर्ण था ,जिसे राजा साहब ने अपने अदम्यसाहस और दृढ इच्छा शक्ति से आधुनिक भारत की परिकल्पना को यथार्थ रूप में परिणत कर दिखाया।जिस नारी स्वतन्त्रता का मुद्दा आज उठाया जा रहा है ,उसकी परिकल्पना राजा साहब १८ वी सदी में ही कर चुके थे।
राजा राम मोहन राय को मिली सफलता हम सब के लिए भी एक प्रेरणा है ,यदि  इरादों में मज़बूती है ,उद्देश्य में पारमार्थिकता है ,न्याय की भावना है ,तो आप एकाकी होकर भी अपने लक्ष्य में सफल हो सकते है।













पारिवारिक पृष्ठभूमि और कृतित्व



जन्म -२२ ,मई-१७७२
जन्म स्थान -बंगाल राज्य के हुगली जिले में स्थित राधा नगरी गांव
पिता -रमाकांत राय (वैष्णव संप्रदाय )
माता -तारिणी देवी  (शैव संप्रदाय )
वैवाहिक जीवन -तीन विवाह
संतान - दो पुत्र -राधा प्रसाद और राम प्रसाद
प्रचलित पहचान -आधुनिक भारत के जनक ,सुधार  आन्दोलन के प्रवर्तक ,
                          बंगाल नव जागरण के पितामह
भाषा के ज्ञाता -बंगला ,फारसी ,अरबी ,संस्कृत ,अंग्रेजी
पत्रकारिता /संपादन /अनुवाद -संवाद कौमुदी ,मिरत-उल-अकबर ,ब्रह्म मैनिकल ,वेदांत सार ,टुफरवुल मुवादीन (फारसी ),विराट उल (पर्शियन )
संस्थापक - आत्मीय सभा  ,ब्रह्म समाज
उपाधि -राजा (मुग़ल शासक द्वारा )
 निर्वाण -२७ सितम्बर ,१८८३ 

Sunday, September 10, 2017

know yourself


कौन है मूर्ख  और कौन है बुध्दिमान ?                             











मूर्ख है वह जो काम पहले करता है और सोचता बाद में है

मूर्ख है वह जो जो अपनी गलतियों को बहाने से छुपाने की  कोशिश करता है

मूर्ख है वह जो अज्ञानी होकर भी अहंकार करें

मूर्ख है  वह जो जल्दी किये जानेवाले काम को तो देरी से करता है और गैर ज़रूरी काम को करने में उतावली दिखलाता है


मूर्ख है वह जो  परिणाम के बारे में विचार किये बिना कार्य करता है 

मूर्ख है वह जो मानता है कि पैसा ही सब कुछ है
मूर्ख है वह जो -की गई गलती को सुधारने के बजाय ,गलती को दुहराता है





मूर्ख है वह जो कर्म किये बिना ,रातों रात धन्ना सेठ बन जाना चाहता है
मूर्ख है वह -जो   अयोग्य अथवा अपात्र को ज्ञान देता है


मूर्ख है वह जो ज़रूरी काम को छोड़कर ,अनुपयोगी काम पर अपनी उर्जा और समय ख़राब करता है

मूर्ख है वह जो मित्र  और हितैषियों के प्रति भी            
छल-कपट की मंशा रखता है

मूर्ख है  वह जो प्राप्य को छोड़कर
अप्राप्य की कामना रखता है अथवा कोशिश करता है

मूर्ख है वह जो स्वयं सिर से पैर तक अवगुणों से ढका है किन्तु स्वयं के दोष न देखकर दूसरों में  दोष ढूढ़ता है ,निंदा करता है

मूर्ख है वह जो अयोग्य और शक्ति हीन  होकर भी अपने से अधिक योग्य या शक्ति शाली से बैर या द्वेष रखता है



मूर्ख है  वह जो भविष्य में किये जाने वले काम का ढिढोरा पहले से पीटना शुरू कर देता है और बड़ी-बड़ी डींगें हांकता है

मूर्ख है  वह जो अच्छे -बुरे की पहचान किये बिना सभी को शक कि नज़र से देखता है

मूर्ख है वह  जो अमानत में खयानत करता है अर्थात जिनके प्रति वह उत्तरदायी है ,उनका हिस्सा उन्हें देने में  बेईमानी करता है या हड़प कर जाने की मंशा रखता है

मूर्ख है  वह जो अपने आत्म-सम्मान का विचार किये बिना बिना बुलाये ही किसी के घर या उत्सव में पहुँच जाता है

मूर्ख है  वह जो अनावश्यक अधिक बोलता है ,विशेष रूप से तब ,जिस विषय के बारे में उसे ज्ञान नहीं होता या आधा -अधूरा ज्ञान होता है                                


मूर्ख है  वह जो बिना सोचे -समझे बोलता है        

मूर्ख है  वह जो उस पर विश्वास करता है जो विश्वास करने योग्य ही नहीं है

मूर्ख है  वह जो कमजोर होकर भी ताक़तवर के सामने क्रोध प्रकट करता है



मूर्ख है  वह-जो आय से अधिक खर्च करता है या क़र्ज़ लेकर घी खाता है






                                       



                                                बुध्दिमान कौन ?बुध्दिमान है वह  -जो जीवन में आनेवाली कठिनाइयों के लिए ईश्वर या भाग्य को दोष न देकर ,अपने बुध्दि बल से कठिनाइयों से मुक्ति पाने कि युक्ति सोचने लगता है

बुध्दिमान है वह  -जो अपनी खामियों और दोषों पर नज़र रखता है और उसमे सुधार करता रहता है

बुध्दिमान है वह  -जो सुख में अति उत्साही और दुःख में अवसाद नहीं करता ,बल्कि दोनों स्थितियों में सम बना रहता है          

बुध्दिमान है वह  -जो मानता है कि पैसा कुछ तो है लेकिन सब कुछ नहीं  

बुध्दिमान है वह  - जो अपने सामर्थ्य के अनुसार कार्य करता है

बुध्दिमान है वह  -जो भौतिक पथार्थों के संग्रह को ही जीवन का उद्देश्य न जानकार ,धर्म का त्याग नहीं करता

बुध्दिमान है वह  -जो अप्राप्य को प्राप्त करने के लिए अपनी शक्ति और समय का अपव्यय नहीं करता

बुध्दिमान है वह  -जो नीति द्वारा करणीय माना गया है ,उसी कर्म को करता है तथा जिसे त्याज्य बतलाया गया है,उसका त्याग करता है या कुविचार आ भी जाये तो अपनी दृढ इच्छा शक्ति से उस विचार का दमन कर देता है
बुध्दिमान है वह  -जो दोष जनित प्रवृतियां(क्रोध ,अति सुख ,अभिमान ,लज्जा , धृष्टता और मनमानी )जीवन उद्देश्य से परे खींचकर ले जाने पर भी उनकी ओर आकर्षित नहीं होता

बुध्दिमान है वह  -जो भविष्य की आशंका से अनीति या अधर्म का आश्रय न ले

बुध्दिमान है वह -जो किसी अन्य को तुच्छ नहीं समझता  ,उपेक्षा नहीं करता  ,तिरस्कार नहीं करता

बुध्दिमान है वह -जो दूसरे के मन की बात को शीघ्रता से भांप ले

बुध्दिमान है वह -जो दूसरों की अच्छी एवं उपयोगी बातों को ध्यान पूर्वक सुनता है

बुध्दिमान है वह -जो दूसरो में दोष निकलने में समय व्यर्थ करने के बजाय अपनी ही गलतियों को सुधारने का प्रयत्न करता है

बुध्दिमान है वह -जो धन,बल ,भुज बल और बुध्दि बल से संपन्न होकर भी निरभिमानी बना रहता है

बुध्दिमान है वह -जो कर्ज लेकर सुख भोगने की अपेक्षा अपनी आय के अनुसार ही खर्च करता है

बुध्दिमान है वह -जो रिश्तों (माता-पिता ,पत्नी- बच्चे ,भाई-बहिन ,अन्य परिजन और मित्रों ) के प्रति संतुलन बनाकर चलता है

Saturday, September 2, 2017

anant chaturdashi -pooja vidhi in hindi

अनंत चतुर्दशी -pooja vidhi









क्यों मानते है अनंत चतुर्दशी ?

कौन है अनंत देव ?

सामान्य जन में यह धारणा है कि अनंत चतुर्दशी का सम्बन्ध भगवान श्री गणेश से है और आम तौर पर गणेश प्रतिमा विसर्जन के रूप में जाना जाता है .जबकि अनंत चतुर्दशी और श्री गणेश में सम्बन्ध सिर्फ इतना है कि गणेश चतुर्थी पर जिन श्री गणेश की प्रतिमा स्थापित की गई थी ,उसके दसवें दिन स्थापित की गई प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है . अनंत चतुर्दशी मुख्य रूप से अनंत भगवान के व्रत के रूप में मनाया जानेवाला व्रत दिवस है ,जो भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी पर किया जाता है .
गणेश चतुर्दशी सामूहिक रूप से मनाया जानेवाला त्यौहार है ,जबकि अनंत चतुर्दशी व्यक्तिगत रूप से मनाया जानेवाला व्रत और पूजन का दिन है .मुख्य रूप से त्रिताप (दैविक,दैहिक और भौतिक ) से अभिशप्त और संतप्त जन ही कष्टों से मुक्ति पाने के लिए इस व्रत का पालन करते है .
अनंत देव कौन है ?
अनंत देव भगवान श्री हरी का ही एक रूप है .भगवान विष्णु के सहस्त्र नामों में से भगवान को अनंत भी कहा गया है .
क्यों मानते है अनंत चतुर्दशी ?
अनंत चतुर्दशी व्रत का महात्म्य पौराणिक ग्रंथों में वर्णित है .अनंत चतुर्दशी को किया जानेवाला यह व्रत ,वह व्रत है ,जिसकी अनुशंसा स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से की थी .भगवान श्री कृष्ण के  कहने पर युधिष्ठिर ने अपने भाइयों सहित अनंत देव का व्रत किया और युध्द में विजय प्राप्त कर अपना राज्य पुन: प्राप्त किया .
अनंत चतुर्दशी पर अनंत भगवान का पूजन  किया जाता है,जो भगवान विष्णु  का ही एक रूप है .इस पूजन में भगवान विष्णु के साथ -साथ यमुना और शेष नाग की भी पूजा की जाती है .पूजा में प्रयुक्त कलश यमुना का , दूर्वा शेषनाग का तथा १४ गांठों वाला सूत्र भगवान अनंत का प्रतीक माना जाता है . १४ गांठों वाला सूत्र भगवान विष्णु के चौदह लोको का भी प्रतीक है . अनंत व्रत को भगवान विष्णु को प्रसन्न करनेवाला तथा उनके द्वारा समस्त पापों का नाश करके अनंत फल देनेवाला माना गया है .और अनंत सूत्र को संकट से रक्षा करनेवाला माना गया है .इस व्रत का पालन करने वाले पुरुष दायें हाथ में तथा स्त्रियाँ बांयें हाथ में अनंत सूत्र बांधते है .इस अनंत चतुर्दशी को बाँधा गया अनंत सूत्र अगली अनंत चतुर्दशी पर उतार कर विसर्जित कर दिया जाता है .तथा नया सूत्र बाँध लिया जाता है .जैसे अनंत चतुर्दशी का व्रत करनेवाला रक्षा सूत्र बांधता है ,वैसे ही उसे भगवान श्री कृष्ण द्वारा धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई गई कथा का पठान ,श्रवण करना पड़ता है .
अनंत चतुर्दशी से जुडी अंतर्कथा इस प्रकार है,जिसे भगवान श्री कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाया था   -

गंगा तट पर धर्मराज युधिष्टिर ने जरासंध के वध के लिए राजसूय यज्ञ किया | इस प्रायोजनार्थ भव्य यज्ञ शाला बनवाई | इस यज्ञ शाला की विशेषता थी कि जल वाला भाग भू समान और भू  भाग जल स्थान सा प्रतीत  होता , भ्रमवश कोई भी जल को थल थल को जल समझ बैठता |
         जब दुर्योधन वहा से  गुजरा तो थल को जल समझ कर वस्त्र ऊचाकर चलने लगा , यह देख द्रौपदी को हँसी आ गई |
 दुर्योधन आगे बढकर जल को भूमि समझ कर उसमे गिर गया | यह देखकर द्रौपदी  सहित अन्य स्त्रियाँ हंसने लगी | इस अपमान से दुर्योधन क्रुद्ध हो उठा | अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए दुर्योधन ने हस्तिनापुर पहुँच कर दुयुत क्रीडा के बहाने पांडवो को हस्तिनापुर आमंत्रित किया और छल से पांडवो का राज्य हथिया लिया | तदन्तर पांडव कष्ट पाते हुए वन – वन भटकने लगे, समाचार  पाकर भगवान श्री कृष्ण पांडवो से मिलने वन मे गए | धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से दारुण दुःख से मुक्त होने का उपाय पूछा | तब भगवान श्री कृष्ण ने कहा की अनन्त का व्रत कर कष्टो से मुक्त हुआ जा सकता है, जो भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को होता है|
  युधिष्टिर ने पूछा – यह अनंत देव कौन है ?
तब भगवान श्री कृष्ण ने बतलाया कि – इसे हमारा ही रूप जानो , जिन्हें कलादि कहा जाता है ,वही अनंत है |
 श्री कृष्ण के वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर अनंत का व्रत का म्हाताम्य और पूजन विधि बतलाने की प्रार्थना करते है |
तब भगवान श्री कृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर को अनंत व्रत की कथा सुनाते  हुए कहते है कि -  सतयुग मे सुमंत नाम का एक ब्राह्मण था , जिसका विवाह भृगु ऋषि की कन्या दीक्षा के साथ हुआ | उन दोनों की एक पुत्री थी शीला | पुत्री के जन्म के पश्चात् दीक्षा काल कवलित हो गई ,तत्पश्चात ब्राह्मण सुमंत ने दुशीला नाम की स्त्री से पुनर्विवाह कर लिया। ब्राह्मण सुमंत की दूसरी पत्नी नाम के अनुकूल दुष्ट स्वभाव और कर्कश वचन बोलने वाली स्त्री थी।  ब्राह्मण सुमंत की पुत्री शीला विवाह योग्य हुई तो ब्राह्मण सुमंत ने वेद वेदांग जानने वाले कौण्डिन्य मुनि से अपनी पुत्री शीला का विवाहकर दिया। 
विवाहोपरांत रीति अनुसार  जब कौण्डिन्य मुनि ने पत्नी दुशीला से जमाता को कुछ द्रव्य पदार्थ देने के लिए कहा तो पत्नी ने स्वाभाव के अनुसार कुटिलता का परिचय  देते हुए कुछ न दिया | मुनि कौण्डिन्य मुनि अपनी नव विवाहिता वधू को लेकर आश्रम की ओर बढ़ गए। मार्ग में विश्राम के लिए विराम किया .समीप ही नदी तट पर स्त्रियों का एक समूह पूजन कर रहा था .शीला ने स्त्री समूह के निकट आकर पूजन के प्रयोजन एवं विधि के बारे में पूछा .स्त्री समूह में से एक स्त्री ने बतलाया कि हमने अनंत का व्रत किया है और उन्ही अनन्त भगवान का पूजन कर रही है .इस व्रत को करनेवाला प्रस्थ मात्र अर्थात एक सेर आटे के माल पुए बनाकर आधा ब्राह्मण को दे देता है और  शेष आधे को स्वयं और कुटुंब जन प्रसाद रूप में गृहण करते है .यथा शक्ति ब्राह्मण को दक्षिणा दी  जाती है .इस व्रत का पूजन नदी तट पर होता है तथा हरि कथा का श्रवण किया जाता है . कुशा का शेषनाग बनाकर बाँस पात्र में रखकर ,मंडप में सविधि पूजन होता है . सूत का धाँगा ,केशर में रंगकर उसमे चौदह गाँठ देकर बांये हाथ में बाँधा जाता है .अनंत देव से प्रार्थना की जाती है कि हे अनंत देव हम संसार रूप सागर में डूबे हुओ का उद्दार करें ,अपने रूप में लींन करें .हे सूत्र रुपी अनंत भगवान ,आपको बारम्बार नमन ,इस भाव से अनंत भगवान का सूत्र बांये हाथ में बांधकर ,भोजन प्रसादी गृहण करते है  .
स्त्रियों से अनंत व्रत का महाम्त्य व पूजन की जानकारी लेकर शीला ने भी अनंत व्रत का निश्चय कर लिया। 
.समयान्तर में अनंत व्रत का प्रभाव दिखाई देने लगा .शीला का घर धन –धान से भरपूर हो गया .
एक दिन  कौण्डिन्य की दृष्टि शीला के हाथ में बंधे हुए अनंत सूत्र पर पड़ गई  , कौण्डिन्य ने शंकित भाव से कहा ,क्या तुमने यह सूत्र मुझे वश में रखने के लिए बाँधा है ?तब शीला ने बतलाया कि यह वह सूत्र है ,जिसके प्रताप से ही हम धन –धान्य से परिपूर्ण होकर सुखी जीवन व्यतीत कर रहे है .किन्तु कौण्डिन्य को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ और उसने बाँह में बंधे हुए सूत्र को तोड़कर अग्नि में डाल दिया .
इस पाप से कौण्डिन्य का सारा वैभव नष्ट हो गया .कौण्डिन्य संपन्न से विपन्न हो गए ,देह संतप्त हो गई और मन दुखी रहने लगा .
कौण्डिन्य ने पत्नी शीला से इस स्थिति का कारण पूछा .शीला ने बतलाया कि अनंत सूत्र को अग्नि में जलाने का जो पाप कर्म आपसे हुआ है ,यह उसी का दुष्परिणाम है .
इस स्तिथि से उबरने के लिए कौण्डिन्य ने भगवान अनंत की  शरण में जाने का निश्चय किया .वह गृह त्याग कर वन में अनंत भगवान की  खोज में निकल गए .मार्ग में जो भी मिलता,उससे पूछते –अनन्त भगवान कहाँ  मिलेगे ? मार्ग में एक आम्र वृक्ष से पूछा, एक गाय से पूछा , एक बैल से पूछा, दो पुष्करिणियों से पूछा, एक हाथी से पूछा ,एक गर्दभ  से पूछा किन्तु सभी ने अज्ञानता प्रकट की। कौण्डिन्य निराश होकर भूमि पर गिर गए .चेतना लौटने पर उन्होंने मन ही मन देह त्याग का निश्चय कर लिया .अपनी जीवन लीला समाप्त करने के लिए जैसे ही वृक्ष की डाल में फंदा लगाकर गले में डालना चाहा,उसी समय दयार्द ह्रदय अनंत भगवान वृध्द ब्राह्मण के रूप में प्रकट हो गए .कौण्डिन्य ने अपनी व्यथा सुनाई. वृध्द ब्राह्मण कौण्डिन्य को अपने साथ एक गुफा में ले गए ,जहाँ एक दिव्य सिंहासन पर भगवान बैठे हुए थे –जिनके अगल-बगल में  शंख ,चक्र ,गदा ,पद्म ,गरुड़  सुशोभित हो रहे थे .अतिशय प्रकाशमान स्वरुप भगवान को देखकर प्रणाम करते हुए कौण्डिन्य ने कहा –हे पुण्डरीकाक्ष ,हम पाप कर्म करनेवाले ,हमारी आत्मा पाप रूप है .हम पाप से उत्पन्न है ,रक्षा करें .आप मेरे समस्त पापों को क्षमा करें .उन्मतावस्था में अनंत सूत्र तोड़ने का पाप कर्म मुझसे हुआ है .अपने पाप कर्म का प्रायश्चित करने के लिए आपके दर्शनार्थ भटक रहा था .अब आपके दर्शन कर मै कृतार्थ हुआ .अब आप कृपा कर मुझ अधम को कष्टों का निस्तारण का उपाय भी बता दीजिये .कौण्डिन्य के ऐसा निवेदन करने पर भगवान ने उपाय बताते हुए कहा कि तुम भक्ति भाव से चौदह वर्ष तक अनंत का व्रत करो ,इस व्रत के सम्पूर्ण होने पर तुम्हे अभीष्ट की  प्राप्ति होगी और अंत में मुझे प्राप्त होओगे .कल्याण करनेवाले इस अनंत व्रत कथा का जो भी प्राणी  श्रवण करेगा ,पापों से मुक्त होकर परमगति को प्राप्त होगा .मनुष्य अपने पाप कर्मों को ही भोगता है .तुमने मार्ग में जो आम्र वृक्ष ,गाय .बैल ,पुष्करीणी,गर्दभ हाथी देखा ,वे सब अपने कर्मों के कारण ही है और अंत में जिस ब्राह्मण से तुम मिले ,वह और कोई नहीं ,मै ही था .यह गुफा कठिन संसार है ,
ऐसा कहकर अनंत भगवान अंतर्ध्यान हो गए .
कौण्डिन्य मुनि की कथा सुनाने के बाद भगवान श्री कृष्ण में कहा कि जिस प्रकार कौण्डिन्य मुनि को चौदह वर्ष में अनंत व्रत का पालन करने का फल मिला ,वैसे ही इस व्रत को करने से अनंत देव की  कृपा से तुम्हारा भी अभीष्ट पूर्ण होगा .हे धर्मराज व्रतों में जिस उत्तम व्रत के बारे में मैंने कहा है ,जिसके श्रवण से प्राणी समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और प्रभु पद को प्राप्त करता है .जो प्राणी संसार रुपी गुफा में सुख खोज रहे है  ,उन्हें  तीनों लोको के स्वामी अनंत देव का पूजन कर ,सूत्र हाथ में बांधना चाहिए .इसी  उद्देश्य से यह कथा मैंने तुमसे कही है .
भगवान श्री कृष्ण की सलाहानुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों सहित अनंत व्रत का पालन किया .अंत में युध्द में विजय प्राप्त कर खिया हुआ राज्य और सुख प्राप्त किया .


विशेष -
वैसे तो अनंत पूजन शास्त्रानुसार षोडशोपचार विधि से मंत्रोच्चारण द्वारा किया जाना चाहिए जो कि सामान्य जन के लिए जटिल साध्य हो सकता है अत एवं अपने नगर के ही किसी ब्राह्मण पंडित द्वारा पूजा विधान करना ठीक रहेगा .यदि संभव न हो तो स्वयं द्वारा अपने गृह निवास पर ही सरल -संक्षिप्त रूप में भी पूजन किया जा सकता है.भगवान को अपने भक्त कर्म -कांड से नहीं भाव प्रवणता से प्रिय होते है .  

अनंत देव की सरल एवं संक्षिप्त  पूजन विधि 
विधि -विधान से पूजा कर्म में भूल वश त्रुटि ना रह  जाये ,इस हेतु पूजन प्रारम्भ करने से पूर्व निम्नलिखित   पूजन सामग्री पूजा स्थल पर एक जगह एकत्र कर ले -
सामग्री -शेष नाग पर विश्राम करते हुए श्री विष्णुजी का एक चित्र /एक मिटटी का कलश /चावल /कपूर/धूप/दूर्वा /पुष्प-पुष्पमाला /ऋतुफल /नैवेद्य -माल -पुआ /अनंत सूत्र के लिए धाँगा /यज्ञोपवीत /पान/सुपारी /लौंग /इलायची /पंचामृत हेतु -दूध ,दही ,घी ,शहद ,शक्कर 
पूर्व तैयारी-
स्नानादि से निवृत होकर पूजा स्थल पर भगवान विष्णु का वह चित्र ,जिसमे भगवान श्री विष्णु क्षीर सागर में शेष नाग पर शयन करते हुए चित्रित किया गया हो ,रख ले चौदह गाँठ लगा हुआ सूत्र (धागा ),इसे कुमकुम या हल्दी में रंग ले नैवेद्य के लिए एक किलो आटे के माल पुए पूजा स्थल पर रोली या चावल से भूमि पर अष्ट दल बना ले 


पूजा स्थल पर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख कर गणेश प्रतिमा के समक्ष ऊन ,कम्बल   या कुश से बने आसन पर बैठ जाये
शिखाबंधन कर माथे पर तिलक लगाए
ॐ केशवाय नमः  ... ॐ माधवाय नमः। ... ॐ नारायणाय नमः 
इन मन्त्रों का उच्चारण करते हुए जल से ३ बार आचमन करे

तत्पश्चात ॐ ऋषिकेशाय  नमः का उच्चारण कर हस्त प्रक्षालन कर ले

पवित्रीकरण हेतु स्वयं तथा पूजन सामग्री पर जल प्रोक्षण करते हुए निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें -
ॐ अपवित्रः पवित्रो व सर्वावस्थाम गतोपि वा
यः स्मरेत पुण्डरीकांक्ष स बाह्यभ्यंतर : शुचि :

ॐ पुण्डरीकाक्ष पुनातु ,ॐ पुण्डरीकाक्ष पुनातु ,ॐ  पुण्डरीकाक्ष पुनातु ,


अब चौकी पर कुछ अक्षत रखे ,तदुपरांत सुपारी पर मौली लपेटकर अक्षत पर रखे (यह श्री गणेश के प्रतीक  है )
ध्यान -
सर्वप्रथम मन ही  मन गणेशजी के रूप का ध्यान करें ,उस ध्यान मे श्री गणेश जी का जो भाव रूप  चित्र उभरे ,उसे संबोधित करते हुए कहे-हे गणपति ,मै आपको प्रणाम करता हूँ

कलश पूजन -
कलश में जल भर ले और फिर चावल या रोली से बने अष्ट दल पर रख दे
हाथ जोड़कर कहे -
ॐ अपां पतये वारुणाये नम:

यमुना जी का ध्यान करें -
सरस्वति ,नमतुभ्यम सर्व काम प्रदायिनी
आगच्छ देवियमुने व्रत सम्पूर्ति हेतवे

1-आहावन /स्थापन  -
हे अनंत देव ,आपको नमन ,मै आपका स्थापन हेतु आहावन करता हूँ ,आप  पधारे तथा यहाँ प्रतिष्ठित होए
2-आसन-
 हे अनंत देव,आपको नमन,आसन ग्रहण करें 
3-पाद्य
हे अनंत देव ,आपको नमन,मै आपके चरणों का प्रक्षालन करने हेतु जल समर्पित करता हूँ ,स्वीकार करें 
4-अर्घ्य  
हे अनंत देव ,आपको नमन,मै आपको गंध मिश्रित अर्घ्य जल समर्पित करता हूँ 
5-आचमन 
 हे अनंत देव ,आपको नमन,मै आपको आचमन के लिए जल  समर्पित करता हूँ 
6-स्नान 
सामान्य जल से स्नान कराते हुए कहे -
 हे अनंत देव ,आपको नमन,मै आपको पाप हारिणी गंगा के जल से स्नान करवाता हूँ ,
पंचामृत से स्नान कराते हुए कहे - 
हे अनंत देव ,आपको नमन,मै आपको दही,दूध ,शक्कर ,घी और शहद मिश्रित पंचामृत से स्नान करवाता हूँ 
शुद्धोदक स्नान -
सामान्य जल से स्नान कराते हुए कहे- 
हे अनंत देव,आपको नमन,मै आपको गंगा ,यमुना ,सरस्वती ,नर्मदा ,गोदावरी आदि पवित्र नदियों के जल से स्नान करवाता हूँ 
7-वस्त्र 
वस्त्र के रूप में मौली चढाते हुए कहे- 
हे अनंत देव ,आपको नमन,मै आपको शीत,वायु ,उष्ण से रक्षार्थ व  लज्जा रक्षक वस्त्र व उप वस्त्र समर्पित करता हूँ 
8-यज्ञोपवीत (जनेऊ ) 
 हे अनंत देव ,आपको नमन,मै आपको यज्ञोपवीत समर्पित करता हूँ ,स्वीकार करें 
9-गंध 
हे अनंत देव , ,आपको नमन,मै आपको चन्दन समर्पित करता हूँ 

10-पुष्प  
हे अनंत देव , ,आपको नमन,आपको नमन,मै आपको पुष्प एवं पुष्प माला समर्पित करता हूँ 
11-धूप 
हे अनंत देव , ,आपको नमन,आपको नमन,मै आपको शुध्द गंध रूप वनस्पति रस से निर्मित धूप  समर्पित करता हूँ 
12 -दीप 
दीप दर्शन कराते हुए कहे - 
हे अनंत देव ,आपको नमन,मै आपको अंधकार का नाश करनेवाला पवित्र ज्योति स्वरूप दीप  दर्शित करता हूँ  
( दीप दिखने के बाद हाथ धोले लें )
13-नैवेद्य  
हे अनंत देव ,,आपको नमन,मै आपको नैवेद्य रूप मे दुग्ध ,घृत और शर्करा युक्त भक्ष्य व भोज्य आहार माल पुआ  समर्पित कर रहा हूँ ,स्वीकार करें 
( तत्पश्चात मुख शुद्धि और हस्त प्रक्षालन हेतु जल छोड़े )
14- ताम्बूल 
 हे अनंत देव , ,आपको नमन,मै आपको मुख वासार्थ लवंग ,इलायची और सुपारी युक्त ताम्बूल समर्पित कर रहा हूँ ,स्वीकार करें 
दक्षिणा समर्पण 
यथा शक्ति धातु के सिक्के अथवा मुद्रा तथा एक नारियल हाथ मे लेकर कहे -
हे अनंत देव ,,आपको नमन,मै यह आपको दक्षिणा रूप मे समर्पित कर रहा हूँ ,स्वीकार करें 

15-प्रदक्षिणा   
हे अनंत देव ,आपको नमन,(मन ही मन प्रार्थना करें कि-)ज्ञात अथवा अज्ञात रूप से जो पाप हुआ है ,वह पद -पद पर परिक्रमा कराते हुए नष्ट हो जाए 
16-पुष्पांजलि 
हाथ मे पुष्प लेकर 
 हे अनंत देव , ,आपको नमन,मै आपको लगनेवाले पुष्प समर्पित कर रहा हूँ ,स्वीकार करें 
( ऐसा कहते हुए हाथों के पुष्प प्रतिमा के समक्ष छोड़ दे )  _
आरती 
(थाली में कपूर जलाकर आरती करें )

अनंत सूत्र प्रार्थना -
दोनों हाथ जोड़कर विनीत भाव से कहे-
हे अनंत देव आपको नमन 
( अ ) सभी परिजन अनंत सूत्र ग्रहण करें 
(ब ) सभी परिजन अनंत सूत्र बाह पर बाँध ले 
मन्त्र उच्चारण करें -
अनंत संसार महा समुद्रे मग्नं समभ्युध्द्र वासुदेव 
अनंर रूपं   विनियोजयस्व अनंत सूत्राय नमो नमस्ते 

ॐ जय जगदीश हरे ,स्वामी जय जगदीश हरे
भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे 
ॐ  जय जगदीश हरे 

जो ध्यावे फल पावे ,दुःख विनसे मन का,स्वामी  दुःख विनसे मन का
सुख सम्पति घर आवे ,कष्ट मिटे तन का 
ॐ जय जगदीश हरे

मात-पिता तुम मेरे ,शरण गहूं मै किसकी स्वामी  शरण गहूं मै किसकी
तुम बिन और ना दूजा ,आस करु मै किसकी 
ॐ जय जगदीश हरे

तुम पूरण परमात्मा तुम अन्तर्यामी ....स्वामी तुम अन्तर्यामी  
पार ब्रह्म परमेश्वर ,तुम सबके स्वामी 
ॐ जय जगदीश हरे
तुम करुणा के सागर ,तुम पालन कर्ता ... स्वामी  तुम पालन कर्ता
मै मूरख खल कामी ,कृपा करो भर्ता
ॐ जय जगदीश हरे
तुम हो एक अगोचर ,सबके प्राणपति ....स्वामी  सबके प्राणपति 
किस विधि मिलू दयामय ,तुमको मै कुमति 
ॐ जय जगदीश हरे

दीन बंधु दुःख हर्ता ,ठाकुर तुम मेरे  ...स्वामी ठाकुर तुम मेरे   
अपने हाथ उठाओ ,द्वार पड़ा तेरे 
ॐ जय जगदीश हरे
विषय विकार मिटाओ ,पाप हरो देवा  ...स्वामी पाप हरो देवा  
श्रध्दा भक्ति बढाओ ,संतान की सेवा 
ॐ जय जगदीश हरे

श्री जगदीश की आरती जो कोई नर गावे ....स्वामी  जो कोई नर गावे 
कहत शिवानन्द स्वामी ,सुख सम्पति पावे
ॐ जय जगदीश हरे ,स्वामी जय जगदीश हरे
भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे 
ॐ  जय जगदीश हरे 
ॐ जय जगदीश हरे

विसर्जन /क्षमा याचना

पूजा में रह गयी त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थना करे -
आवाहनं न जानामि न  जानामि तवार्चनम
पूजा चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर
पूजन पूर्ण होने पर साष्टांग प्रणाम करें