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Friday, July 21, 2017

mukesh-saranga teri yaad mein

मुकेश -जन्मतिथि पर विशेष 

















२२ जुलाई -१९२३ 

कभी -कभी मेरे दिल में ख्याल आता है 
कि  क्यों मुकेश जैसा गायक संगीत प्रेमियों  को फिर क्यों नहीं मिला ?

दुनिया बनने वाले क्या तेरे दिल में समायी 
कि  तूने फिर मुकेश जैसा गायक पैदा क्यों  नहीं किया

मुकेश के बिना हर संगीत प्रेमी कह  रहा है
ज़िंदा हूँ इस तरह से 


इसी मुकेश ने कभी अपने प्रशंसकों  से कहा था -
मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने 

आज भी मुकेश की वह आवाज़ मेरे कानों में गूंज रही है ,जो गा -गा कर कह रहा है -
मेरा जूता है जापानी फिर भी दिल है फिर भी दिल है हिन्दुतानी 

...
इतने सालों बाद भी मुकेश की यादों को भुला नहीं पाया 
यह मेरा दीवानापन है ,या .

आज २२ जुलाई को मैं  फिर मुकेश को आवाज़ देता हुए कह रहा हूँ -
ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना 


फिर भी मुकेश ने मेरी बात ना  सुनी  तो मुझे कहना पड़ेगा -
दोस्त -दोस्त ना रहा 


मुकेश जैसे मुझसे कह रहे है -
मैं  पल दो पल का शायर था पल दो पल की कहानी थी 


फिर मुकेश ने मुझे ढांढस  देते हुए कहा कि  बहुत साल मैंने कहा था ना कि -
एक दिन बिक जायेगा माटी के मोल ,जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल 


आज भी जब मुकेश की याद आती है ,लबों से ये ही निकलता है
जाने कहाँ गए वो दिन ,कहते थे तेरी याद में

मुकेश के कुछ  बेहद लोकप्रिय गीत 

दिल जलता  है तो जलने दे  ...  
आंसू भरी है ये जीवन की राहे  .... 
प्यार हुआ ,इकरार हुआ  हाँ दीवाना हूँ मैं  .... 
हम छोड़ चले है महफ़िल को  ..... 
हम तेरे आशिक़ है सदियों पुराने .... 
हमने अपना सब कुछ खोया प्यार तेरा पाने को .... 
हर दिल जो प्यार करेगा .... 
होंठों  पे सच्चाई रहती है .... 
हम तुझसे मोहब्बत करके सनम .... 
चांदी की दीवार ना तोड़ी ,प्यार भरा दिल तोड़ दिया ... 
 इचक दाना बीचक दाना ...  
  जाना तुम्हारे प्यार में। .... 
ढम ढम ढिगा -ढिगा ..... 
मेरा प्यार भी तू है .... 
मेरे मन की गंगा और तेरे मन की जमुना का .. 
कई बार यूं  भी देखा है  .... 
बस यही अपराध मै  हर बार करता हूँ  .... 


मुकेश के बारे कुछ अन्य जानकारी 

मुकेश के सभी प्रशसकों को चाहिए कि  वे मोती लाल के प्रति आभार व्यक्त करे क्योकि वे ऐसे शख्स थे ,जिनकी वजह से हुनके प्रशंसकों को मुकेश जैसा गायक मिल सका। 





मुकेश ने फिल्मों में अपनी शुरूआत नायक के तौर पर की ,फिल्म थी निर्दोष(१९४१ )। 
१९४५- में बनी फिल्म  पहली नज़र में गाया गीत   दिल जलाता है तो जलने दे  इस गाने में  के एल सहगल का प्रभाव ज्यादा और मुकेश की पहचान  कम  

/

आवाज़-दिलीप कुमार/राज कपूर /मनोज कुमार /
मुकेश को-राज कपूर की आवाज़ के रूप में  पहचान मिली 
फिल्म निर्माता के रूप में भाग्य आज़माया- फ़िल्में थी  -मल्हार( १९५१) /अनुराग-(१९५६ )लेकिन घाटे का सौदा साबित हुई 
-नायक के रूप माशूका और अनुराग फिल्मों में   अभिनय किया लेकिन  दोनों फ़िल्में  फ्लॉप रही 
१९५० के अंत में शीर्ष गायक बन गए 
आवाज़ को पहचान देने वाली फिल्मे थी  -मधुमती/अनाडी /यहूदी 


 में प्रदर्शित राज कपूर की फिल्म अनाडी में गए गीत  सब कुछ सीखा  हमने ना सीखी होशियारी के पहला  फिल्म फेयर अवार्ड- १९५९
दूसरा फिल्म फेयर अवार्ड - १९७० 
तीसरा फिल्म फेयर अवार्ड-१९७२ 
चौथा  फिल्म फेयर अवार्ड-१९७६
 १९७४ में प्रदर्शित  रजनी गंधा फिल्म  में गए गीत- कई बार यू  भी देखा है    राष्ट्रीय  पुरस्कार मिला 
जन्म-२२ जुलाई १९२३ 
मृत्यु २७ अगस्त १९७८ 







Thursday, July 20, 2017

tilak aazad hue -23july ko


२३ जुलाई
चन्द्र शेखर आज़ाद  और बाल गंगाधर तिलक के जन्म दिन पर विशेष 

२३ जुलाई ,इतिहास के पन्ने  की वह तारीख ,जो याद  दिलाती है भारत माता के उन सपूतों की ,जिन्होंने गुलामी की ज़ंजीरों में जकड़ी अपनी  मातृभूमि को आज़ाद करने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। इसी तारीख को जन्मे थे ये वीर भूमि के वीर पुत्र। आज उनके जन्म दिन पर याद करते है उनकी वीर गाथा को  ....   



















चन्द्र शेखर आज़ाद

१५ अगस्त ,१९४७ को देश आजाद  हुआ।  आजादी का श्रेय  किसे  दिया जाए ?  उन्हें , जिन्हें राष्ट्रवादी कहा जाता था  या उन्हें जिन्हें क्रांतिकारी  कहा  जाता  था ?  दिमाग वालो  को  या दिल वालो को ?  किसी  हिंदी  फिल्म  के सुपर  हिट  होने  पर  सफलता  का सारा श्रेय  फिल्म के नायक नायिका  को  मिलता  है  और  थोड़ा बहुत फिल्म के निर्देशक  को भी  किन्तु  फिल्म की कथा ,पटकथा ,संवाद  लिखने  वाला लेखक  ,गीतकर - संगीतकर और  तकनीशियन  परदे के पीछे  गुमनाम  ही रह जाते  है।   आजादी  की सफलता  की  कहानी  भी  बहुत  कुछ  super hit हिंदी फिल्म   की तरह ही है।  गाँधी  और  नेहरू   आजादी की सफलता के नायक बन गए किन्तु  वे सब क्रन्तिकारी कही गुमनामी के अँधेरे  में   खो  गए  , जबकि  देश  को  आजाद  करने  में उन क्रांतिकारियों की भी अहम  भूमिका  थी।  अंग्रेजी  हुकूमत  को  डर  अहिंसा  के पुजारी और शांतिदूत कहलानेवाले   गाँधी या नेहरू  से नही बल्कि  मातृभूमि के लिए  सिर  पर   कफ़न  बांधकर और  जान हथेली  पर लेकर  घूमने वाले क्रांतिकारियों  से था।  ऐसे ही  क्रांतिकारियों  में  एक  क्रन्तिकारी की कहानी आपको सुनाता हूँ, जिसने स्वतन्त्रता  संग्राम की काकोरी डकैती  कांड , साण्डर्स   हत्याकांड  , असेम्बली  बम  कांड  जैसी प्रमुख  घटनाओ   में शानदार सह नायक  की भूमिका निभाई  थी ,लेकिन जिसकी  भूमिका किसी नायक से कम नहीं थी । स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में जिस युवक को सहनायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है ,उसे हम अपनी कहानी का नायक बनायेगे।



यह वह दौर था जब गाँधीजी भारतीय जनता के नायक बने हुए थे। उनकी एक आवाज़ पर जनता मर-मिटने के लिए तैयार हो जाती थी। बात  उन दिनों की है जब गाँधी जी  का असहयोग आंदोलन  चरम  पर था - शायद  ही कोई भारतीय  हो , जो इस  आंदोलन  से प्रभावित न रहा हो।  गांधीजी  से प्रभावित १५-१६ का एक युवक  आंदोलन में कूद जाता है , जिसे गिरफ्तार कर लिया जाता है और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है। मजिस्ट्रेट  द्वारा  नाम पूछने पर युवक अपना नाम आजाद बतलाता है ।  उसे  १५  बैत  की सजा  सुनाई  जाती है। हर   बेत  पर वह किशोर  वंदे  मातरम  , 'महात्मा गाँधी और भारत माता की जय  का उद्घोष  करता है। यही युवक हमारी कहानी का नायक है।
बाद में नायक का गांधीजी के प्रति मोह भंग हो जाता है। कारण  था -गांधीजी द्वारा चोर-चौरी कांड के बाद असहयोग आंदोलन बंद कर देने की घोषणा। नायक की मुलाकात क्रन्तिकारी प्रणवेश चटर्जी से होती है। प्रणवेश  चटर्जी नायक का परिचय हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक राम प्रसाद बिस्मिल से कराता है। दल में शामिल होने के लिए नायक अग्नि को साक्षी मानकर अपना सबकुछ समर्पण कर देने की प्रतिज्ञा करता है। दल में शामिल होने  के बाद नायक गांधीजी के असहयोग वापस लेने से नाराज़ विद्रोही क्रन्तिकारी राम कृष्ण को दल  में शामिल करने का कार्य कर अपने बुद्धि चातुर्य का परिचय देता है।
नायक और उसके साथियों को अपनी योजनओं को अंजाम  देने के लिए धन की ज़रुरत थी। इस पर नायक कहता है -
टूटी हुई बोतल है ,टूटा हुआ पैमाना 
सरकार तुझे दिखा देंगे ठाठ फकीराना
क्रांतिकारी दल अपनी योजनाओ को अंजाम तक पहुँचाने के लिए धन की कमी महसूस करता है ,जिसके लिए दल के लोग डकैती डालकर धन एकत्र करने की योजना बनाते है। इस योजना में नायक के साथ थे -राम प्रसाद बिस्मिल ,राजेन्द्र लाहिड़ी ,रोशन सिंह ,शचीन्द्र नाथ बक्शी,राम कृष्ण खत्री ,मन्मथनाथ गुप्ता और अशफाकउल्ला खाँ। पहले तो अमीरों को लूटने की योजना बनाई जाती है किन्तु इससे दल की प्रतिष्ठा पर विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका से सरकारी धन को लूटने की योजना पर सहमति बनती  है। इसी योजना से जन्मा था काकोरी डकैती कांड। इस घटना के बाद नायक ब्रिटिश हुकूमत डकैती में शामिल क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करने में जुट जाती है। नायक गिरफ़्तारी से बचने के लिए झाँसी पहुँच जाता  है ,जहाँ वह कुछ दिन एक  मंदिर में साधु वेश में रहता है ,उसके बाद कानपुर आ  जाता है और एक अन्य क्रांतिकारी गणेश विद्यार्थी से मिलता है। यही उसकी मुलाकात होती   है -भगत सिंह से। नायक भगत सिंह के साथ मिलकर काकोरी डकैती कांड में गिरफ्तार  साथियों को छुड़ाने की योजना बनाता है ,किन्तु योजना असफल हो जाती है। काकोरी डकैती कांड के साथी राम प्रसाद बिस्मिल ,राजेन्द्र लाहिड़ी ,रोशन सिंह और अशफाकउल्ला खां को फाँसी  दे दी जाती है। इसी बीच हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट आर्मी हो जाता है।
उधर लाल लाजपत राय  साइमन कमीशन  के विरोध में निकाले गए जुलूस में पुलिस मुठभेड़ में बुरी तरह ज़ख़्मी हो जाते है और उसके कुछ दिन बाद ही लाला  लाजपत राय की मौत हो जाती है। लाला  लाजपत  राय  की मौत का बदला  लेने के लिए नायक अपने साथी भगत सिंह ,राजगुरु और जय गोपाल के साथ मिलकर अंग्रेज अफसर साण्डर्स की हत्या कर देता है।
अहिंसा के पुजारियोंऔर शांतिदूतों को अंग्रेजी सरकार विषहीन साँप की तरह समझती थी,अतएवं अंग्रेजी सरकार उनकी ओर से निश्चिन्त थी। शांति और विनम्रता की याचना शायद अंग्रेजों को सुनाई नहीं दे रही थी। अंग्रेजों के कान खोलने के लिए नायक और उसके साथियों द्वारा असेम्बली पर बम धमाका करने की योजना बनाई जाती है किंतु किन्ही कारणों से नायक को इस जोखिम से अलग रखा जाता है। असेम्बली में बम फेंकने की योजना को अंजाम दिया भगत और बटुकेश्वर दत्त ने। भगतसिंह और और उसके साथियों को गिरफ्तार कर उन पर मुक़दमा चलाया गया। भगत सिंह ,राजगुरु और सुख देव को फांसी की सजा सुनाई गई। अंग्रेजों पर गांधीजी का प्रभाव देखते हुए भगत सिंह और साथियों को फाँसी  की सजा से बचाने  के लिए गांधीजी से गुहार की गयी किन्तु अहिंसा के पुजारी कहलानेवाले गांधीजी को भारत माता के  देश भक्त पुत्रों से ज्यादा अपने आदर्श और सिंद्धान्त प्रिय थे। इस मामले में हस्तक्षेप करना उन्हें अपने आदर्श और सिंद्धान्त के खिलाफ लगा और उन्होंने  किसी भी प्रकार की सहायता करने से इंकार कर दिया। अहिंसा और शांति का राग गुनगुनाने वालों का क्रांतिकारियों के प्रति उपेक्षित व्यवहार को देखकर कहा कहा होगा -
शहीदों की चिताओं पर पड़ेंगे खाक के ढेले 
वतन पर मिटानेवालों कायही  निशा होगा
उधर साण्डर्स  हत्या कांड के लिए नायक को ज़िम्मेदार मान रही अंग्रेजी सरकार नायक को जासूसी कुत्तों की तरह खोज रही थी,लेकिन नायक ने भी अंग्रेजों के हाथ न लगने की कसम खाई थी । असेंबली बम कांड के बाद नायक दल लगभग टूट सा गया था। नायक इलाहबाद आता है और नेहरू जी से मिलता है किन्तु अहिंसा और शांति के पुजारी के इस अनुयायी ने भी कोई उदारता नहीं दिखलाई। क्रोध से आग बगूला  हुआ नायक   अल्फ्रेड पार्क आता है। तभी किसी मुखबिर के द्वारा पुलिस को नायक के अल्फ्रेड पार्क में होने की खबर दे दी जाती है। नायक के अल्फ्रेड पार्क में होने की खबर पाकर पुलिस अल्फ्रेड पार्क को चारों  ओर से घेरकर फायरिंग करती है ,नायक अकेला मुकाबला करता है। इस मुठभेड़ में नायक पुलिस की गोलियों से ज़ख़्मी हो जाता है ,लेकिन खुद को अंग्रेजों के हाथ न लगने देने की सौगंध पूरी करने के लिए आखरी गोली खुद को मारकर इच्छा मृत्यु को प्राप्त कर लेता है। उसने जैसा कहा था -कर दिखाया।वह  कहा करता था -
दुश्मन की गोलियों का सामना  हम करेंगे 
आज़ाद ही रहे है ,आज़ाद ही मरेंगे 
इतिहास गवाह है इस बात का कि देश को जितना नुकसान दुश्मनों ने नहीं पहुचाया ,उससे ज्यादा घर के गद्दारों ने पहुँचाया। कहा है न कि  -कुल्हाड़ी में अगर हत्था ना होता तो लकड़ी के कटने का रस्ता  न होता।
जो कहानी आप पढ़ रहे थे ,वह किसी रील लाइफ की कहानी नहीं  बल्कि रियल लाइफ की कहानी के नायक की थी और उस रियल लाइफ के नायक का नाम था -चन्द्र  शेखर आज़ाद ,जो आज़ाद जिया और आज़ाद मरा ।
चन्द्र  शेखर आज़ाद में वे सारी  खूबियाँ  थी ,जो उसे नायक की पहचान देती है। खान-पान और विचारों की सात्विकता के कारण  उनके साथी उन्हें पंडित जी कहकर संबोधित करते थे। वे रूस की बोल्वेशिक क्रंति से अत्यधिक प्रभावित थे।
आज़ाद ने अपना सब कुछ मातृ भूमि को समर्पित कर दिया था,यहाँ तक कि  माता-पिता के प्रति अपने पुत्र दायित्व को भी । एक बार जब भगत सिंह और साथियों ने उनके परिवार को आर्थिक सहायता देने की बात कही तो आज़ाद ने कहा कि  मुझे निष्काम भाव से कर्म करना है। न मुझे दौलत की चाह है और न शौहरत की।
कहा जाता है कि  इरादों के प्रति सख्त आज़ाद का ह्रदय भीतर से उतना ही कोमल था। फरारी के दिनों में आज़ाद ने जिस घर में शरण ली थी ,उस घर में एक वृद्धा अपनी युवा बेटी के साथ रहती थी । जब विधवा  ने आज़ाद को बतलाया कि  धनाभाव के कारण  वह अपनी बेटी का विवाह नहीं कर पा रही है। उन्होंने उस युवती को बहिन मानते हुए आर्थिक सहायता की।
आज़ाद की भावना शब्द बनकर इस रूप में व्यक्त हुई -
माँ हम विदा हो जाते है ,विजय केतु फहराने आज
तेरी बलिवेदी पर चढ़कर माँ ,निज शीश कटाने आज
मलिन वेश में ये आंसू कैसे ,कम्पित होता है क्यों गात
वीर प्रसूता क्यों रोती है ,जब तक है खंजर हमारे हाथ
धरा शीघ्र ही धसक जाएगी ,टूट जायेंगे ,पर न झुकेंगे तार
विश्व कम्पित हो जायेगा ,होगी जब माँ रण हुँकार
नृत्य करेंगी प्रांगण में फिर-फिर जंग हमारी आज
अरि शीश गिराकर कहेंगे ,भारत भूमि तुम्हारी आज
जब शमशीर कातिल लेगा अपने हाथों में
हज़ारों सिर  पुकार उठेंगे ,कहो कितने की है दरकार



लोकमान्य  बाल  गंगाधर तिलक 

















लोकमान्य  बाल  गंगाधर तिलक  भारतीय विभूतियों के आकाश का  वह देदीप्यमान  नक्षत्र  है ,जो भारत की आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने का दिशा बोध कराता  रहेगा। आज २३ जुलाई को इस महान देश -भक्त का भारत की धरा पर अवतरण हुआ था।
 लोकमान्य  बाल  गंगाधर तिलक न सिर्फ एक,कुशल राजनीतिज्ञ  बल्कि   ,समाज सुधारक ,आध्यात्मिक क्षेत्र के प्रकाण्ड -विद्वान् ,  विचारक -चिंतक , पुस्तकों के लेखक और उग्र  विचारधारा के प्रवर्तक ,जैसे बहुमुखी प्रतिभा से आलोकित व्यक्तिव के धनी  थे।

गुलामी की जंज़ीरों में जकड़े हुए भारतवासियों  की नसों में उबाल  लाने के लिए जिसने कहा था -
अपने हितों के लिए यदि हम स्वयं जागरूक नहीं होंगे तो दूसरा कौन होगा ?हमें इस समय सोना नहीं चाहिए ,हमें अपने लक्ष्य की पूर्ति  के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

इस महान पुरुष के व्यक्तित्व का आकलन उसके कथन से नहीं ,उसके कार्यों से ही किया जा सकता है

लोकमान्य  बाल  गंगाधर तिलक के व्यक्तिव को जानने के लिए उनके जीवन के इतिवृत के पृष्ठों को पलट कर देखना होगा।
कहते है ,पूत के पाँव  पालने में ही नज़र आ जाते है। इस तथ्य को बाल  तिलक ने बचपन में प्रमाणित कर दिया था

बचपन में एक बार जब अध्यापक ने मूंगफली के छिलकों के लिए कक्षा के सभी बच्चों को सजा देनी चाही तो तिलक ने सजा पाने से स्पष्ट मना  कर दिया और कहा कि   जो अपराध मैंने किया ही नहीं उसकी मैं  सजा नहीं पाउँगा।जो यह प्रमाणित करता है कि  तिलक बचपन से ही निर्भीक ,न्याय प्रिय ,और स्पष्टवादी थे।

एक अन्य घटना का यहाँ उल्लेख किया जाना समीचीन होगा जो तिलक के चुनौतियों से खेलने का उदहारण
है -तिलक की गणित विषय में बहुत रूचि थी और अक्सर कठिन -जटिल सवालों को सुलझाने में लगे रहते थे। उनके मित्र ने उनसे पूछा कि  तुम सरल जवाबों की बजाय कठिन सवाल को क्यों  चुनते हो ?तब तिलक ने उत्तर देते हुए कहा कि  कठिन चुनोतियो का सामना करके ही जीवन में आगे बढ़ा जा सकता   है।

तिलक भारतीय-सभ्यता -संस्कृति के प्रबल समर्थक थे। सादा जीवन उच्च विचार रखने वाले तिलक ने कभी पाश्चात्य पहनावा स्वीकार नहीं किया। वे हमेशा सादा  रेशमी धोती पहना  करते थे। प्रतिदिन व्यायाम करते थे। तिलक की स्पष्ट वादिता के लिए इन्हें मि.ब्लंट और शारीरिक सौष्ठव के कारण मि.डेविल कहा जाता था।
तिलक ने जो योग्यता प्राप्त की ,उस योग्यता से वे कोई भी सरकारी पद प्राप्त कर सकते थे किन्तु राष्ट्र सेवा को सर्वोपरि मानते हुए सरकारी सेवा में जाना स्वीकार नहीं किया। एल एल बी की डिग्री पूरी कर लेने के बाद वे आगरकर ,चिपलूणकर और एम.बी.नामजोशी के साथ राष्ट्र सेवा  में जुट  गए। तिलक का मानना था कि  समाज सुधार  से पहले स्वाधीनता की ज्यादा ज़रुरत है। हालाँकि  इस विचारधारा के कारण  उन्हें विरोध भी सहन पड़ा  था। शिक्षा में सुधार के लिए न्यू  इंग्लिश स्कूल की स्थापना की ,जिसका उद्देश्य  देशवासियों की अंतः चेतना  जाग्रत करना  था।आगे चलकर इसे डेकन एजुकेशन सोसाइटी  में तब्दील कर दिया गया।

देशवासियों में जन -जागृति लेन के लिए उन्होंने समाचार पत्रों को माध्यम बनाया और केसरी  तथा मराठा  पत्रों का प्रकाशन किया। जिसमे ब्रिटिश शासकों की नीतियों पर प्रहार किया जाता था।तिलक ने ब्रिटिश सरकार  को हिन्दू विरोधी  और मुस्लिम समर्थक बतलाया। इस कारण उन्हें हिंदूवादी और मुस्लिम विरोधी होने के आरोपों का सामना करना पड़ा।
तिलक सामाजिक कार्यों में भी बढ़ -चढ़ कर हिस्सा लेते थे। १८९६ में अकाल और १९०२ में फैले प्लेग  के समय तिलक ने जैसी तत्परता दिखलाई उससे उनके सामाजिक हितों का प्रहरी होना प्रमाणित हो जाता है।
तिलक जहाँ नारी शिक्षा  और हिंदी को राष्ट्र भाषा बनने के हिमायती थे ,वही बाल-विवाह और छूआ -छूत  के विरोधी भी थे।
प्लेग के दौरान अंग्रेज  अधिकारी सहायता की आड़ लेकर अमानवीय कृत्य भी कर रहे थे। तिलक ने अपने समाचार पत्रों के माध्यम से ब्रिटिश अधिकारियों के द्वारा किये जा रहे दुर्व्यहार को प्रमुखता के साथ छापा।
इसी बीच चापेकर बंधुओ ने   अंग्रेज इंस्पेक्टर रैंड की   हत्या कर दी। तिलक पर  चापेकर बंधुओ को उकसाने और राज द्रोह के लेख छापने का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया। अंतर-राष्ट्रीय  स्तर  पर इस गिफ्तारी पर  प्रतिक्रियाए हुई और तिलक के साथ नरमी बरतते हुए उनकी रिहाई की सिफारिशें की गयी। ,इस पर तिलक को रिहा कर दिया गया।
१८९९ में लार्ड कर्जन के शासनकाल में बंगाल का बटवारा कर दिया गया ,इसका देश व्यापी विरोध हुआ।
यही से कांग्रेस भी दो खेमों गरम और नरम  में बंट  गयी। लाला  लाजपत राय ,विपिन चन्द्र पाल और बाल गंगाधर तिलक गरम दल  में आ गए। गरम दल  बाल पाल लाल की तिकड़ी कहलाती थी।
बंगाल बटवारे पर तिलक के उग्रवादी  विचारों के कारण  उन पर राज द्रोह का आरोप लगाकर उन्हें देश से , निष्कासित कर मांडले  जेल भेज दिया गया। इसी जेल में उन्होंने गीता रहस्य  और द आर्कटिक होम ऑफ़  द  आर्यन पुस्तकें लिखी। १९१४ को तिलक को मांडले जेल से रिहा कर   दिया गया।
भारत लौट कर वे स्वराज प्राप्ति के लिए चलाये जा रहे   श्री मती एनी बेसेंट के  होम रूल आंदोलन से जुड़ गए। जगह -जगह जाकर सभाएं आयोजित करते ,जन-समुदाय को सम्बोधित करते।
स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है ,मैं  इसे लेकर रहूंगा ,इस संकल्प को पूरा  करने में लगे इस महान देश भक्त को १ अगस्त १९२० को मृत्यु ने अपने अंक में भर लिया।
उस महान देश भक्त का तिलक आज भी भारत माता  के ललाट पर दमक रहा है।

 लोकमान्य  बाल  गंगाधर तिलक के जीवन का संक्षिप्त परिचय -
बचपन का नाम -केशव
प्रचलित नाम -बाल  गंगाधर तिलक
सम्मानित उपाधि -लोक मान्य /हिन्दू राष्ट्र वाद का जनक
जन्म -२३  जुलाई ,१८५६
जन्म स्थान चिखली गाँव /जिला -रत्नागिरी (महाराष्ट्र )
पिता -गंगाधर रामचन्द्र तिलक
माता -पार्वती  बाई
पत्नी -तापी (परिवर्तित नाम -सत्य भामा )
संतान -दो पुत्र ,तीन पुत्रियां

 शिक्षा -बीए आनर्स (१८७६ )
            एल एल बी (१८७९ )

Friday, July 14, 2017

mangal pandey -the great rebal



जन्म तिथि पर विशेष




मंगल पांडेय
१९ जुलाई १९२७
प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत


हरे -भरे वृक्ष पर लगे फल -फूल को देखकर न सिर्फ मन प्रसन्न होता है बल्कि उसकी प्रशंसा में मुख से शब्द भी फूट पड़ते है ,लेकिन हमारा ध्यान उस बीज की ओर नहीं जाता ,जिसने दूसरो को मीठे रसीले फल और शीतल छाया देने के लिए अपने आप को मिटटी में दबा दिया  ... वह मिटटी में दबकर अँधेरे में सड़ा -गला और पूरी तरह से खुद को  मिटटी में मिला दिया। यही बीज अंकुरित हुआ ,पौधा बना  ... पल्लवित हुआ  ... विकसित हुआ और फिर घना छायादार पेड़ बना। इसी तरह जिस स्वतन्त्र देश में स्वतन्त्र नागरिक के रूप में  हम स्वाभिमान के साथ साँस ले रहे .. स्वतन्त्रता के लहलहाते हुए वृक्ष पर उन्नति  ...प्रगति  ... विकास के फल को पकते हुए देखकर खुश हो रहे है ,इस स्वतन्त्रता रुपी वृक्ष  का बीज कौन था ?
किसने अपने प्राण फूंक कर स्वतन्त्रता की अलख जलाई थी ?
किसने अपने प्राणो को बीज बनाकर ज़मीन में दफ़न कर दिया था ?


                                                                 
 उस हुतात्मा का नाम था -मंगल पांडेय


१९ जुलाई १९२७ को उत्तर प्रदेश के फ़ैजाबाद में पैदा हुआ था स्वतंत्रता संग्राम का  यह अग्रदूत ,जिसने राख की परतों के नीचे दबी स्वतंत्रता की  चिनगारी को प्राण फूँककर  सुलगाया था।

ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ  यह बालक अपने पिता के नाम दिवाकर के समान तेजस्वी और माता के नाम निर्भया के समान निर्भीक  ...
 पिता  के कुल और माता की  कोख को जिसने धन्य किया धर्म रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग कर  ...

था एक  मामूली सा सिपाही ईस्ट इंडिया कंपनी की छावनी में नेटिव इन्फेंट्री सेना का ,जो कलकत्ता के नज़दीक बैरकपुर में थी।

जैसे द्रोपदी की सौगंध ने ,जो उसने  दुशासन के सामने ली थी - तेरे रक्त से धोकर ही मै अपने यह खुले हुए केश उस दिन बाँधूँगी .. इस एक वाक्य ने महाभारत खड़ा कर दिया था। उसी तरह उस समय अछूत समझे जाने एक आदमी को जिसे मंगल पांडेय ने पानी पिलाने से मना कर दिया था ,उसने व्यंग करते हुए कहा था -मुझसे तो अछूत होने के कारण घृणा करते हो ,उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ चला जाता है ,जब गाय और सूअर की चर्बी लगा कारतूस मुँह से लगते हो ?
इस वाक्य ने कट्टर ब्राह्मण मंगल पांडेय को विद्रोही बना दिया।
कहा जाता है कि सिपाहियों को एनफील्ड नाम की बंदूकें दी गयी ,जिसे चलाने के लिए पहले कारतूस  को मुँह से खोलना पड़ता था ,जिस पर गाय और सूअर की चर्बी लगी होती थी ।
यह बात पहले किसी को पता नहीं थी। इस सेना के अधिकांश सिपाही या तो ब्राह्मण थे  या फिर मुसलमान। गाय हिन्दुओं के लिए पवित्र और सूअर मुसलमानों के लिए अपवित्र। इस रहस्योघाटन  से दोनों सम्प्रदाय के सिपाही भड़क उठे।
 इस कारतूस का इस्तेमाल करना  दोनों ही सम्प्रदाय के लिए धार्मिक भावनाओ को आहत और धर्म भ्रष्ट करने जैसा था।

भीतर ही भीतर अंग्रेजों के विरुध्द विद्रोह की चिंगारी सुलग उठी -हिन्दुओ में भी और मुसलमानों में भी।

मनुष्य शारीरिक कष्ट तो सहन कर सकता है, लेकिन कोई उसकी धर्म की पवित्रता को कलुषित करें ,यह कोई भी धर्म परायण बर्दाश्त नहीं कर सकता . मंगल पांडेय भी कैसे बर्दाश्त कर सकते थे....  -कट्टर ब्राह्मण जो थे।

यह वह दौर था जब ईसाई मिशनरी भारत में धर्मान्तरण कर रही थी।

कहा जाता है कि धर्म भ्रष्ट करने के उद्देश्य से ही चर्बी वाले कारतूस दिए गए थे।

एक दिन  जब नेटिव इन्फेंट्री के सैनिकों को चर्बी वाले कारतूस का प्रयोग कैसे करना है ,इसका प्रशिक्षण दिया जा रहा  था,मंगल पांडेय ने विरोध प्रकट करते हुए कारतूस का प्रयोग करने से मना कर दिया। इस पर उन्हें फौजी हुक्म सुनाया गया -वर्दी उतारने और रायफल लौटने का

 २९ मार्च ,१ ८५७ -
मंगल पांडेय के भीतर सुलग रहा ज्वाला मुखी  फूट पड़ा  -
गुस्साये मंगल पांडेय ने मैदान के बीच खड़े होकर अपने साथियों को विद्रोह के लिए पुकारा , लेकिन भय के कारण कोई साथी साथ न आया ,
सामने आये दो अंग्रेज अफसर -मि.बाफ और मि. ह्यूसन।
मंगल पांडेय ने दोनों अंग्रेज अफसरो को मौत के घाट उतर दिया।
ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर ऐसा माना  जाता है कि मंगल पांडेय ने खुद को गोली मारकर  जीवन लीला समाप्त करने  का प्रयास किया था ,किन्तु  ऐसा न हुआ।
कहा जाता है कि एक अन्य अफसर हियर्सी ने आस-पास जमा सिपाहियों में से किसी एक सिपाही को मंगल पांडेय को पकड़ने का आदेश दिया, लेकिन थोड़ी देर के लिए वह सिपाही भी गूँगा -बहरा बन गया।बताया जाता है कि  आदेश न मानने के आरोप में इस सिपाही को भी फाँसी दे दी गयी थी।
मंगल पांडेय को गिरफ्तार कर कोर्ट मार्शल किया गया
६ अप्रैल को फांसी की सजा सुनाई गयी -फांसी दी जाने की तारीख तय हुई थी - १८ अप्रैल
मंगल पांडेय को फांसी दिए जाने के फैसले के बाद सैनिक छावनियों में ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुध्द विद्रोह की आवाज़ आने लगी थी।
किसी बड़े खतरे की आशंका से ८ अप्रैल को ही मंगल पांडेय को फांसी पर लटका दिया गया।
कहा जाता है कि जिन जल्लादों को फांसी  देने का हुक्म दिया गया था ,उन्होंने  मगल पांडेय को अपने हाथों से फांसी देने से इंकार कर दिया था। मंगल पांडेय को फांसी देने के लिए कलकत्ता से जल्लाद बुलाये गए थे।

मंगल पांडेय की शहादत ने सूखी घास में चिंगारी डालने का काम किया।
१० मई १८५७  को मेरठ छावनी में हुए सैनिक विद्रोह का होना इस बात का प्रमाण है कि  मंगल पांडेय की शहादत ही ज्वाला बनाकर भड़की थी।

 प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत क्रान्ति वीर  मंगल पांडेय को   उनके जन्मदिन पर शत-शत नमन।


Thursday, July 6, 2017

guru poornima in hindi

गुरु पूर्णिमा


ॐ सह नाववतु
सह नौ भुनक्तु
सह वीर्यं करवावहै
तेजस्विनावधीतमस्तु
मा विद्विषावहै
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति :



हे प्रभु ,हम गुरु -शिष्य की रक्षा कीजिये। आनंद का पान कराइये। हमारा ज्ञान राष्ट्र हित  में हो। हम द्वेष  .. विरोध न करें  .. अत्यंत प्रेम से अध्ययन -अध्यापन करें -कराये  ... हमें आध्यात्मिक ,आधि भौतिक ,आधि दैविक शांति प्राप्त हो  ...
ऐसी पवित्र प्रार्थना का दिन है  -गुरु  पूर्णिमा 

शिष्य द्वारा अपने श्री गुरु के प्रति श्रध्दा ,सम्मान और समर्पण अर्पित कर कृतज्ञता प्रकट करने का दिन है आज है .
गुरु पूर्णिमा ,जो आषाढ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार चतुर्वेद और महाभारत जैसे धर्म ग्रंथों के प्रणीता आदि गुरु माने जाने वाले कृष्ण द्वैपायन व्यासजी का आविर्भाव इसी दिन हुआ था .



गु अर्थात अन्धकार रु अर्थात प्रकाश ,इस तरह देखा जाये तो गुरु वह है,जो मनुष्य को अज्ञानता के अन्धकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाये .अज्ञान का नाश करनेवाला प्रकाश ब्रह्म गुरु ही है ,इसमें संशय नहीं है। 
स्कन्द पुराण के उत्तर खंड में भगवान शिव ने माता पार्वती के समक्ष गुरु महिमा की महत्ता का अत्यंत विस्तार से प्रतिपादन किया है .भगवान शिव कहते है कि-
गुरु ,ब्रह्म और ज्ञान स्वरुप आत्मा से भिन्न नहीं है .यह सत्य है ,इसमे लेशमात्र भी संशय नहीं .श्री गुरु की सेवा से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है .श्री गुरु सेवा से सर्व तीर्थ स्नान का पुण्य प्राप्त हो जाता है .अज्ञान को जड़ से उखाड़ने और जन्म-कर्म का निस्तारण का सामर्थ्य गुरु सेवा से ही प्राप्त हो सकता है .श्री गुरु का निवास काशी है , तो उनका चरणोदक गंगा है .श्री गुरु साक्षात् विश्वेश्वर और तारक ब्रह्म है .वे अक्षय वट है ,तीर्थराज प्रयाग है .श्री गुरु का इस प्रकार स्मरण करना चाहिए ,जैसे कोई कुलीन स्त्री अपने स्वामी का स्मरण करती है .सत्य ज्ञान की प्राप्ति गुरु कृपा से ही  प्राप्त होती है .गु का अर्थ अन्धकार है और रु का अर्थ प्रकाश अर्थात गुरु ही अज्ञानता रुपी अन्धकार को मिटाकर ज्ञान रुपी अलोक से आलोकित करता है . गुरु पद देवताओं के लिए भी दुर्लभ है .शिष्य को चाहिए कि कर्म ,मन और वाणी से गुरु आराधना करें .उसे सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए .
मै स्वयं ऐसे गुरु को नमस्कार करता हूँ जो संसार रुपी वृक्ष पर आरूढ़ होकर नरक रुपी समुन्द्र में गिरते हुए प्राणियों का उध्दार करता है .जो ब्रह्मा , विष्णु , शिव , परब्रह्म के सम तुल्य  है. जो  संसार सागर को पार करने लिए सेतु रूप है . जो माता,पिता और इष्ट तुल्य है .जिसके अस्तित्व से संसार का अस्तित्व है .
शिव के रुष्ट होने पर गुरु रक्षण करने वाले है किन्तु गुरु के रुष्ट होने पर शिव भी रक्षण नहीं कर सकते .जिस दिशा में श्री गुरु के चरण विराजते है ,उस दिशा में भक्तिपूर्वक नमस्कार करना चाहिए .
श्री गुरु के स्वरुप का चिन्तन शिव स्वरुप के चिन्तन और गुरुमंत्र का जाप शिव जाप के सम तुल्य है .श्री गुरु से बढ़कर कोई तत्व नहीं ,गुरु सेवा से बढकर कोई तप नहीं , ध्यान ,पूजा ,मन्त्र और मोक्ष का मूल गुरु ही है .गुरु से परे और श्रेष्ठ कुछ नहीं .
देव ,गन्धर्व ,किन्नर ,पितर,यक्ष,ऋषि और सिध्दि भी गुरु सेवा से परामुख हो तो ,वे भी कभी मुक्त नहीं हो सकते .श्री गुरु का ध्यान आनंद ,सुख ,भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है .
गुरु से अधिक कुछ नहीं है  .... कुछ नहीं है .... कुछ नहीं है
गुरु तत्व ही कल्याणकारी है  .... गुरु तत्व ही कल्याणकारी है  ....गुरु तत्व ही कल्याणकारी है
शिष्य को गुरु के बताए मार्ग से मन की शुध्दि करनी चाहिए .गुरु से कभी परा मुख नहीं होना चाहिए .गुरु की निंदा करनेवाला तब तक नरक भोगेगा ,जब तक सूर्य –चन्द्र रहेगे . गुरु का सम्मान ना करनेवाला निर्जल अरण्य में ब्रह्म राक्षस के समान है .गुरु सेवा से वंचित को अभागा मानना चाहिए .
सच्चे गुरु भक्त से माता-पिता ,कुल –वंश और पृथ्वी भी स्वयं को धन्य मानती है .
गुरुजनों की सेवा करने से स्वर्ग ,धन -धान्य ,विद्या ,पुत्र ,सुख आदि कुछ भी दुर्लभ नहीं है। वेद के अनुसार गुरु के अनुसार गुरु से बढ़कर वंदनीय और पूजनीय अन्य कोई नहीं है. 
श्रीमद्भगवद गीता में कहा है-गुरु वह है जो ज्ञान दे और ब्रह्म की ओर ले जाये। 


गुरु गोविन्द दौउ खड़े काके लागु पाय
बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दियो बताये
गुरु की महिमा को अवर्चनीय और अवर्णित बताते हुए कबीर कहते है कि-
सब धरती कागद करूँ , लेखनी सब  बनराय
सात समुंदर मसि करु ,गुरु गुण लिखा ना जाए
सच्चा गुरु दुर्लभ है ,जिसे मिल जाए वह सौभाग्यशाली है –
यह तन विष की बेलरी ,गुरु अमृत की खान
शीश दिए जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान
हरि रूठ जाये तो गुरु शरण है ;किन्तु गुरु के रूठने पर उसकी रक्षा देवता भी नहीं कर सकते ,स्कन्द पुराण में भगवान शिव के इस कथन की  कबीर ने भी पुनरावृत्ति करते हुए कहा है -
कबीरा ते नर अंध है  ,गुरु को कहते  और  
हरि रूठे गुरु ठौर है ,गुरु रूठे नहि ठौर 
चाणक्य ने गुरु निंदा तो क्या ,गुरु की निंदा  सुनने को भी पाप बतलाया है।
तुलसीदासजी ने गुरु स्तुति करते हुए लिखा है -
बंदऊ  गुरु पद कंज ,कृपा सिंधु नर रूप हरि 
माया  मोह तम पुंज ,जासु वचन रविकर  निकर   

तुलसीदासजी ने गुरु के सम्बन्ध में कहा है -
गुरु बिन भव निधि तराई  न कोई 
जो बिरंचि संकर सम   होई 
अर्थात संसाररूपी सागर को कोई अपने आप तर नहीं सकता। चाहे वः ब्रह्माजी जैसा सृष्टि कर्ता हो या संहार कर्ता शिव हो। अपने मन की चाल से अपनी मान्यताओं के जंगल से निकलने के लिए पग डंडी दिखानेवाले सद्गुरु अवश्य चाहिए। 
करता करें ना कर सकें ,गुरु करें सब होय 
सात द्वीप नौ खंड में गुरु से बड़ा न कोय 

चाणक्य और चंद्र गुप्त ,समर्थ गुरु रामदास और शिवजी तथा  राम कृष्ण परम हंस और स्वामी विवेकानन्द उदहारण है। 
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गुरु 
वर्तमान में वैश्विक व्यवसायीकरण ने गुरु धर्म को भी व्यवसाय बना दिया है।आध्यात्मिक ज्ञान के स्थान पर शारीरिक मानसिक घरेलू परेशानियाँ दूर करने या भौतिक सुख प्रदान अथवा आकस्मिक धन लाभ का प्रलोभन देने वाले तांत्रिक गुरु बन बैठे है। ऐसे तथाकथित -छद्म गुरुओं ने  गुरु प्रतिष्ठा को न सिर्फ क्षति पहुँचाई है बल्कि गुरु के प्रति आस्था और विश्वास की जड़ों को कमज़ोर किया है।समय-समय पर टीवी न्यूज़ चैनल ,समाचार पत्र और सोशल मिडिया पर वायरल होनेवाले प्रकरण इस तथ्य की पुष्टि करते है । व्यक्तिगत हित साधने वाले ऐसे गुरु -शिष्य जहाँ एक ओर पवित्र भावना को कलुषित कर रहे है ,वही दूसरी ओर गुरु के प्रति की युगों से चली आ रही आस्था ,विश्वास और समर्पण की भावना को भी कलंकित कर रहे है। 
गुरु लोभी शिष्य लालची ,दोनों खेले दॉव 
दोनों बूडे बापूरे ,चढ  पाथर की नाव 
यदि गुरु शिष्य अपना -अपना हित साधनेवाले हुए तो पत्थर की नाव में बैठ कर नदी पार करने जैसी मूर्खता होगी। 
जाका गुरु भी अंधला ,चेला खरा निरन्ध 
अंधे ,अँधा ठेलिया ,दोनों कूप पड़ंत 
ऐसा गुरु न अपने शिष्य का कल्याण कर सकता है और न ऐसा शिष्य अपने गुरु का लाभ उठा सकता है। 
एक ओर गुरु ऐसे शिष्य को तलाश रहा है जो आर्थिक लाभ दे सकें और शिष्य ऐसे गुरु को तलाश रहा है ,जो आर्थिक लाभ पहुंचा सकें। दूसरी ओर सच्चा गुरु सच्चे शिष्य को तलाश रहा है और सच्चा शिष्य सच्चे गुरु को तलाश रहा है। 
सच्चे गुरु दुर्लभ है। हमें अपने बुध्दि विवेक से सच्चे और छद्म गुरु को पहचानना है।चाणक्य और चंद्र गुप्त, समर्थ गुरु रामदास और शिवजी महाराज  तथा राम कृष्ण परम हंस और स्वामी विवेकानंद जैसे गुरु -शिष्य आज भी है ,बस -पहचानना शेष है । 
 समय जो गतिशील है ,समय जो परिवर्तनशील है ,समय के साथ –साथ बहुत कुछ बदल जाता है .जो परम्पराएँ और मान्यताएँ कभी देश ,समाज और मानव कल्याण का अनिवार्य अंग हुआ करती थी ,उन परम्पराओ  और मान्यताओ में से कुछ  समय के साथ –साथ अप्रासंगिक होती चली गई और कुछ विलुप्त प्राय-सी हो गई .जो परम्पराएँ और मान्यताएँ कभी हुआ करती थी ,लेकिन आज नहीं है.लेकिन उनमे से कुछ परम्पराएँ और मान्यताएँ ऐसी है जो कल भी थी ,आज भी और कल भी रहेंगी.



Sunday, July 2, 2017

lamhein-hindi poem

लम्हें 

 ये लम्हे भी बड़े अजीब होते है
कभी दामन फूलों से
तो कभी काँटों से भर देते है








कोई लम्हा ठंडी हवा का अहसास करा जाता है
धूप में बादल का टुकड़ा बन छा जाता है
कभी कोई लम्हा नश्तर सा चुभ जाता है
भरे हुए ज़ख्मों को हरा कर जाता है










कभी अपना
तो कभी बेगाना सा लगता है
कभी जाना –पहचाना
तो कभी अनजाना सा लगता है








निकालकर न फेंकों ज़िन्दगी से ऐसे लम्हों को
हर लम्हा नसीहत देकर जाता है
ज़िन्दगी का मक़सद बन जाये समेट लो ऐसे लम्हों को
ऐसे लम्हों को सम्भाल लो ,संवार लो
हो सकें तो बाँट लो




 हर लम्हे को जिओ ,भरपूर जिओ
क्योकि  बीता हुआ लम्हा लौटकर नहीं आएगा
जो आज है ,अभी है ,वही हमारा है

कल वही अतीत बन जायेगा 

Sunday, June 18, 2017

poem on father in hindi


पिता 
पितृ दिवस पर विशेष 





पिता यथार्थ में पीता है
मगर ,मदिरा नहीं
अपनी संतान के सारे कष्ट पीता है
कष्ट की एक- दो बूँद नहीं
सारा समंदर पीता है
बच्चों के लिए जीता है
इसीलिए वह पिता है 
सुनाई नहीं देता किसी को उसका क्रंदन
है पाषाण लेकिन उसमें भी है स्पन्दन 
 दिल उसका भी रोता है
समंदर का पानी किनारे से बाहर नहीं आता
पिता के भीतर का आंसू भी बाहर नहीं आता
माँ से वह इक्कीस नहीं, न सही
लेकिन उन्नीस भी नहीं
वह भी बीस है
औरों के लिए न सही
अपनी संतान के लिए रईस है
जो धूप में बादल का टुकड़ा बनकर चलता है  
जो सरदी में तन संतान का ढक ठिठुरता है
जो बरसात में छाता बनके छा जाता है
इसीलिए पिता कहलाता है
वो नाव है ,पतवार है ,किनारा है
हर एक का सहारा है
मुसीबतों से कभी न हारा है
संतान के लिए
ईश्वर जितना ही प्यारा है
माँ का विश्वास है  ,
संतान की आस है ,
इसीलिए वह ख़ास है  

Sunday, June 11, 2017

baal shramik diwas

१२ जून , बाल श्रमिक दिवस पर विशेष












दृश्य -१
स्थान -सड़क के किनारे बने ढाबे का वह हिस्सा जहाँ बरतन साफ़ किये जाते है 
समय -दिन
पात्र -१३-१४ वर्ष का एक दुबला -पतला बच्चा,एक युवा  सामाजिक कार्य कर्ता



एक दुबला -पतला बच्चा बरतन साफ़ कर रहा है। एक युवा सामाजिक कार्य कर्ता बच्चे के पास आकर रुकता है। बच्चे को रोक कर पूछता है -
सामाजिक कार्य कर्ता -क्या नाम है तेरा ?
बच्चा -मज़बूर मज़दूर
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- तुम्हारी मज़बूरी क्या है ?
बच्चा - भूख पढ़ने नहीं देती ,चिंता खेलने नहीं देती और सरकारी कानून कायदे काम नहीं करने देते
युवा सामाजिक कार्य कर्ता-बाप का नाम ?
बच्चा - गरीब चंद
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- माँ का नाम ?
बच्चा - मज़बूरी देवी
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- कहाँ रहता है ?
बच्चा - पुलिया के नीचे
युवा सामाजिक कार्य कर्ता-तेरा बाप क्या काम करता है ?
बच्चा - दिन को मज़दूरी करता है और रात को दारू पीकर सोता है
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- और माँ ?
बच्चा - वह भी मज़दूरी कराती है
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- कितने भाई -बहिन हो ?
बच्चा - गिनती आती तो क्या यहाँ मज़दूरी करता
 युवा सामाजिक कार्य कर्ता- खाता क्या है ?
बच्चा - दुत्कारे
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- पीता  क्या ?
बच्चा - आँसू
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- बड़ा होकर क्या बनाना चाहता है ?
बच्चा - चोर उच्चका बदमाश
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- मान लो ,मै भगवान हूँ ,मुझसे क्या माँगेगा ?
बच्चा - जितने भी गरीब आदमी है उन सब को नपुसंग बना दे
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- मै तुझे कुछ देना चाहूँ। तो क्या मांगेगा ?
बच्चा - आज रात का खाना और सलमान खान की  फिल्म का टिकट
युवा सामाजिक कार्य कर्ता-  .... और कपडे ?
बच्चा - उसकी क्या ज़रुरत ,कपड़ों की ज़रुरत बेशर्मो को होती है ,अपनी बेशर्मी  को ढकने के लिए
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- सरकार से क्या चाहता है ?
बच्चा - हमारे लिए जो नियम-कायदे  बनाये है , उन्हें किताब से निकल कर हमें दे दे। उन्हें रद्द्दी वाले को बेचकर सल्लू भाई की मूवी देखूँगा
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- समाज से क्या चाहते हो ?
बच्चा - हमें रोटी न दे न सही ,कम से कम हमे धिक्कारे तो नहीं
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- पैसे वालों लोगों को  तुम्हारी तरफ से क्या कहूँ ?
बच्चा - उनसे कहना हमारा खून चूसनेवाले पैने दाँत निकालकर समुन्दर में फेंक दे  या आसमान में उछाल दे
युवा सामाजिक कार्य कर्ता -नहाते क्यों नहीं  ... और फटे मैले-कुचले कपडे क्यों पहनते हो ?
बच्चा -(हंसकर ) कैसे पढ़े-लिखे साहब हो आप भी  ? इतना भी नहीं समझते ,साफ़-सुथरे कपड़ों में हमें गरीब कौन  समझेगा ,ऐसे रहते है , तभी तो काम मिलता है।
(तभी बैकग्राउंड से ठेकेदार की आवाज़ ओवर लेप होती है )
आवाज- ओ सूअर के बच्चे  ... क्या कर रहा है वहाँ  ...काम तेरा बाप करेगा ?
बच्चा -चलता हूँ ,साब
धीरे-धीरे चलते हुए बच्चा कैमरे की फ्रेम से बाहर  निकल जाता है ,
कट.
यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं बल्कि हमारे समाज की हकीकत है,आईना है।
क्यों यह बाल मज़दूर हालात के मज़बूर  है ?
क्यों खुशियाँ  इनसे दूर है ?
बच्चा है ,लेकिन पिता जितना बोझ ढो  रहा है। अखबार -किताबें खरीदता है, लेकिन पढ़ने के लिए नहीं बल्कि बेचने के लिए ,जिससे यह रोटी खरीदता है अपने लिये  और अपने घर वालों के लिए । दूसरे बच्चो को मैदान में खेलते देखकर बाल मज़दूर सोचता तो है ,मै  भी खेलू ,इस विचार के दूसरा विचार आता है, मै  खेलूँगा तो घर कैसे चलेगा  ..... चूल्हा कैसे जलेगा ? दूसरे बच्चों को कंधे पर बस्ता लेकर स्कूल जाते हुए देखकर पढ़ने की इच्छा  तो होती है ,लेकिन मज़बूरी पैरों को कारखाने की तरफ मोड़ देती है।

ये बच्चे जिनके चेहरे फूलों की तरह खिले होने चाहिए ,मुरझाये हुए है। ये बच्चे चुप है, लेकिन इनकी आँख से निकलनेवाली हर बूँद समाज से सवाल  करती है ,क्यूँ  ... आखिर क्यूँ  ..ये बच्चे पेटभर खाना खाकर छत के नीचे मुलायम बिस्तर पर सोते हुए सपने नहीं देख सकते ?
कचरा बीनता हुआ यह बच्चा कूड़े के ढेर में अपना खोया हुआ बचपन ढूढ़ रहा है या अपनी बीमार के लिए दवाई के पैसे या फिर अपने छोटे भाई-बहिन के रोटी ?
इधर मौसम बदलता है। उधर उसके रहने की जगह। रात कहाँ बिताएगा -किसी सीवरेज पाइप में ? ओवर ब्रिज के नीचे ? सड़क के किनारे फुटपाथ पर या सड़क के बीचों बीच बने डिवाइडर पर ? पता नहीं।
आइस क्रीम पार्लर पर किसी को  आइसक्रीम खाते देखकर  ...  कन्फेक्शरी की दूकान के बाहर किसी को चॉकलेट खाते देखकर  ... चाट के ठेले पर किसी को गोल-गप्पे खाते देखकर  जो आँखें दूर खड़ी  भूखी नज़रों से घूर -घूर कर देख रही है ,उस पर गुस्सा करूँ  या तरस खाऊ ? गुस्सा करू तो किस पर ? इस बच्चे के माँ -बाप पर जिन्होंने इसे पैदा किया ?  या फिर सामाजिक और सरकारी व्यवस्था पर ?सोचता हूँ, क्यों  इनके कन्धों पर बस्ता नहीं  ... क्यों इनके हाथों में गेंद नहीं  ... इनके चार कपड़ों में से दो कपडे  कौन छीनकर ले गया ?
सर्दी हो ,गर्मी हो ,या बरसात  ... आंधी आये या तूफ़ान  वक़्त पर जाना है। देर हो गई तो गलियां सुननी पड  सकती है और पीटा भी जा सकता है। जरूरी काम से छुटटी करनी पड़ गई ,पगार कट जाएगी ,अनजाने में नुकसान हो गया ,पगार में से काट लिया जायेगा । नियोक्ता को बच्चों को काम पर लगाने का सबसे बड़ा फायदा तो यह होता है कि बाल मज़दूरों से आधी मज़दूरी देकर दुगना काम लिया जा सकता है।
जिन बच्चों को देखकर हमारे समाज के प्रबुद्ध और साहित्यकार कहते है -ये देश के कर्ण धार है  ... ये देश का भविष्य है।  ... तो क्या ऐसा होगा देश का भविष्य  ... ऐसे होंगे देश के कर्ण धार ? होटल -ढाबे पर काम करते हुए
... सडकों पर कार साफ़ करते हुए  ... कचरे में से कुछ ढूढ़ते हुए  ... फुटपाथ पर बूट पोलिश करते हुए  ... ऐसे बच्चों से बनेगा देश का भविष्य ? क्यों बच्चों का शारीरिक -बौद्धिक विकास का स्वर्णिम अवसर छीनकर रोटी के लिए इनके  बचपन की हत्या की जा रही है ? क्यों वर्तमान के लिए भविष्य को कुचला जा रहा है ?








   

भारत में बाल श्रमिकों की संख्या दुनिया के दूसरे से ज्यादा ही नहीं बल्कि स्तिथि भी दिल दहला देनेवाली है। फिरोजाबाद के चूड़ी उद्योग में ये मासूम बच्चे १००४ डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान में दहकती भट्टियों में काम कर रहे है। दरियों और कालीनों कीबनवाई में इनकी कोमल अंगुलियां टूट सी गयी है ,इसी तरह आतिश बनाने वाले कारखानों में पोटाश ,सल्फर और फास्फोरस जैसे खतरनाक रसायनों में काम करते हुए अस्थमा ,टी बी जैसी बीमारियों से ग्रसित हो रहे है , बल्कि कितनी बार तो विस्फोटक दुर्घटनाओं में जल - मर जाते है। इसी तरह खेती के काम के अतिरिक्त जयपुर और सूरत में रत्न पोलिश ,मुरादाबादमें पीतल ,खुर्जा में चीनी मिटटी  ,सम्बलपुर में बीड़ी ,लखनऊ में जरी की कढ़ाई , अलीगढ़ में  ताला ,  मन्दसौर में  स्लेट ,मेघालय में  काँच उद्योग में लाखों बच्चे रोटी के लिए ज़िन्दगी बहुत सस्ते में बेचने के लिए मज़बूर हो रहे है।बच्चों की यह स्तिथि समाज के माथे पर कलंक है, तो मानवता के गाल पर थप्पड़ है।  
गंदे ,फ़टे कपड़ों में इन बच्चों को देखकर एक बार तो मन करता है कि चीख -चीखकर गालियाँ दूँ ,इनके माँ -बाप को ,जिन्होंने इन बच्चों को पैदा किया। समझ नहीं आता कैसे दूँ इन बच्चों को शिक्षा ? कैसे करूँ इनकी रक्षा ?सरकार से गुहार करता हूँ ,सरकार कहती है, हमने एक नहीं ,दो नहीं ,ढेरों कानून बनाये है इनके के लिए। समाज से कहता हूँ ,समाज कहता है ,कितनी सारी  संस्थाएं खोले बैठे हम इन बच्चों के लिए। राष्ट्रीय स्तर से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक कोशिश हो रही है इन बच्चों की हालत सुधारने के लिए। फिर भी लाखों -करोड़ों  की संख्या में बाल श्रमिक क्यों ? १२ जून से सोचना शुरू करता हूँ ,अगला १२ जून आ जाता है ,स्तिथि वही की वही ,न जवाब मिलता है और न समाधान।