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Friday, February 23, 2018

inspirational &motivational quotes

inspirational motivational quotes





छोटा सा दीपक पूरे अंधकार को तो नही मिटा सकता किन्तु अपने आस-पास के अँधेरे को अपनी क्षमतानुसार थोड़ी दूर तक ज़रूर धकेल देता है। मनुष्य को भी चाहिए की निठल्ले बैठे रहने की अपेक्षा  थोड़ी बहुत कोशिश ज़रूर कतरा रहे  ,सारे दुःख तो दूर नहीं होंगे लेकिन दुखों का बोझ पहले से कुछ  कम  ज़रूर हो जायेगा।  








काम करने और सोचने में वही अंतर है जो चलने और बैठे रहने में है  



वह धन किस काम का जो मन की शांति खोकर ,अपनों से दूर होकर और ,आत्मा के विरुध्द अर्जित किया हो
मनुष्य बाहरी अनेक बातें तो जानना चाहता है, किन्तु यह जानने का प्रयास नहीं करता कि  वह स्वयं क्या है ?
इतिहास हार कर बैठ जाने वालों से नहीं ,विफल हो जाने के बाद फिर से प्रयत्न करनेवालों से बनता है





भविष्य की चिंता और भूतकाल का शोक मनुष्य से उसके वर्तमान का सुख भी छीन लेता है। कहा भी है -
चिंता ज्वाला शरीर को बन दावा  लगि  जाए 
प्रकट धुआँ दिखे नहीं , उर अंतर धुन्धुआए   

  गलती होना स्वाभाविक है ,क्योकि गलती मनुष्य से ही होती है किन्तु गलती स्वीकार कर उसे  सुधार लेनेवाला बुध्दिमान है ,खुद की गलती को दूसरों पर थोपकर स्वयं को निर्दोष साबित करनेवाला मूर्ख है 


बाहर से निर्दोष कहलाने की कोशिश करने की अपेक्षा ,मन से निर्दोष बने रहने की कोशिश कहीं ज्यादा अच्छी है 



महत्वाकांक्षी के लिए प्रसिध्दि खारे जल की तरह है ,जितना ही वह पीता है ,उसकी पिपासा उतनी ही बढाती जाती है  

आलस्य से छोटे से छोटा काम भी कठिन जान पड़ता है किन्तु उत्साह से असंभव कार्य भी आसान हो जाते है।




यदि मनुष्य चिंतन ,चरित्र और व्यवहार बदल ले ,तो सद्विचार स्वत :आने लगते है 



कठिनाइयों का समाधान  बाहर खोजने की बजाय अपने भीतर खोजे 

जिसे तुम पाना चाहते थे किन्तु पा न सके ,तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम उसे चाहते ही नहीं थे 



पशु न बोलने से कष्ट पता है और मनुष्य  बोलने से 


प्रतिशोध की भावना मनुष्य  को मलिन ,दूषित और दुराचारी बना डालती है




कल को आज से बेहतर कैसे बनाये ?इसका एक ही उपाय है -दृष्टिकोण बदल दीजिये।
 किसी ने क्या खूब कहा है -सोच बदल दिजिए,सितारे बदल जायेगे
नज़र बदल   दीजिये ,नज़ारे बदल जायेगे
कश्तियाँ बदलने की ज़रुरत नहीं
दिशा बदल दीजिये ,किनारे बदल जायेगे


मूर्खों का समय व्यर्थ की बातों ,सोने में और आलस्य में जाता है। जबकि बुध्दिमानों का समय सत्कर्म और सद्ज्ञान में व्यतीत होता है

धैर्य का फल ऊपर से कड़वा होता है और भीतर से मीठा 

खुशियां बाहर से नहीं भीतर से तय होती है 

बर्फ और तूफ़ान फूलों को नष्ट कर सकते है ,बीज को नहीं 
धन -दौलत तो अकूत  कमाई जा सकती है किन्तु पेट अकेला उसे पचा नहीं सकता 




निष्ठुरता निर्जीव का लक्षण है ,यदि मनुष्य भी संवेदना शून्य हो जाये तो तो निर्जीव और मनुष्य का अंतर ही समाप्त हो जायेगा

भावना रहित मनुष्य का ह्रदय चट्टान की तरह निष्ठुर हो जाता है

वास्तविक स्वरुप की जानकारी न होने पर मनुष्य ना सोचने वाली बातें सोचने लगता है और न करने योग्य कार्य करने लगता है

समस्त कार्यों का मूल -विचार है। मस्तिष्क में जिस तरह के विचार लाएंगे है ,उसी प्रकार के कार्य होने लगते है
निष्ठा से परिपूर्ण पुरुषार्थ में अद्भुत शक्ति है


संवेदनाओं में करुणा का समावेश कर लेने पर ह्रदय में उदारता स्वत :उत्पन्न हो जाती है 




Tuesday, January 30, 2018

sant ravidaas jayanti in hindi

संत महाकवि –रैदास
         
३१ जनवरी ,
रवि दास जयंती 














आज अवतरण दिवस है उस महान संत शिरोमणि और आध्यात्मिक विभूति का जिन्होंने कट्टर ब्राह्मणवाद से प्रभावित जातिवादी व्यवस्था के  कुटिल विषम जाल को काटने और मुस्लिम शासकों द्वारा फैलाये  विष को निष्फल कर  मानव –मानव में दया ,करुणा,प्रेम ,सौहार्द ,क्षमा और समानता लिए प्रेरणा बनकर समतामूलक समाज की प्रतिष्ठा की. ऐसे संत कवि रविदास ने  14 वीं सदी में माघ पूर्णिमा रविवार को काशी की पुनीत भूमि पर जन्म लिया .

स्वाभाव से परोपकारी दयालु और उदार संत रैदास ने अपनासमस्त जीवन विषम सामाजिक व्यवस्था को एक रस  बनाने में व्यतीत किया। ईश्वर भजन और संतों की संगति से उन्हें आनंदानुभूति होती थी। वे मानते थे कि  जैसे जल और लहर बाह्य दृष्टि भिन्न है ,वैसे ही विभिन्न धर्म धर्मान्तरों के विभिन्न ईश्वरीय रूप आंतरिक रूप से एक ही है। समस्त प्राणियों के ह्रदय में ईश्वर नित्य,निराकार रूप में व्याप्त रहते है। ईश्वर सत्य है ,अवर्चनीय है ,एकरस है -
प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी ,जाकी अंग अंग बास समानी 
प्रभुजी ,तुम दीपक हम बाती। जाकी ज्योति  जले दिन राति  
उन्होंने अपने उपदेशो में कहा है -संसार से   अनासक्त रहकर ,अपना सर्वस्व प्रभु चरणों में समर्पित कर ही ईश्वर प्राप्ति की जा सकती है। उनका विश्वास खंडन-मंडन से अधिक आत्मिक उत्थान पर था।
वे कहते थे प्रभु की बूअक्ति छोड़कर किसी अन्य का आश्रय लेने वाला कभी सुख नहीं पा सकता। उन्होंने अपने पद कहा भी है -
हरि  सा हीरा छाड़ि  कै ,करै आन की आस
ते नर जमपुर जाहिगे ,सत भाषै रैदास   











मनुष्य जन्म से नहीं कर्म एवं उच्च विचारों से महान बनता है –संत महाकवि रैदास पर यह कथन अक्षरश: चरितार्थ होता है ,जो अपने समय में चर्मकार कुल में उत्पन्न होकर अपना पैतृक व्यवसाय करते हुए  भी संत शिरोमणि से विभूषित हुए .वे जितने कवि थे ,उतने ही समाज सुधारक भी .उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से सन्देश दिया कि मनुष्य ,मनुष्य है –-नीच अथवा अछूत कह देने मात्र से कोई अंतर नहीं पड़ता .ईश्वर ने जाति नहीं ,सिर्फ मनुष्य बनाया है –

जाति-जाति में जाति है,जो केतन के पात
रैदास मनुष न जुड़ सके जब तक जाति न जा ,


जन्म जात मत पूछिए का जात अरु पात


रविदास पूत समप्रभ के काउ नाहि जात कुजात

रैदास कबीर के समकालीन थे .कबीर ने स्वयं रैदास के लिए कहा था –संतन में रविदास संत

उनके काव्य में कबीर की भांति ही आडम्बर के विरुध्द स्वर मुखरित होता है .कबीर की तरह ही मूर्ति पूजा और तीर्थ यात्रा के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति के उपायों का खंडन किया .कबीर की तरह ही अनपढ़ किन्तु आध्यात्मिक चेतना से परिपूर्ण थे .उनका मानना था कि मनुष्य ईश्वरीय अंश है .पवित्र ह्रदय ईश्वर तुल्य है .


उनके काव्य में ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी दोनों का अपूर्व समन्वय देखा जा सकता है। आत्मनिवेदन ,दैन्यभाव और सहजता रैदास के काव्य की प्रमुख विशेषता थी .वे भी हिन्दू –मुस्लिम जैसे सांप्रदायिक विचारों के विरोधी थे .-यह वह समय था जब भारत धर्मान्दमुस्लिम शासकों के भय से भयाक्रांत था .हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य चरम पर था .ऐसे समय में सर्वधर्म सम भाव का उद्घोष करते हुए संत कवि रैदास के कहा -

रैदास कनक और कंगन माहि जिमी अंतर कछु नाहि
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन  तुरकन माहि

हिन्दू तुरक नहीं   भेदा ,सभी मह एक रक्त और मासा
दऊ एकहू दूजा नाहि ,पेख्यो सोई रैदासा


कृस्न,करीम ,राम ,हरि ,राघव ,जब लग एक न पेखा
वेद ,कतेब ,कुरान ,पुरानन ,सहज एक नहीं देखा

वे कहते थे अहंकार का त्याग करके ही ईश्वर की प्राप्ति की जा सकती है .आकर में बड़ा होकर भी हाथी शक्कर नहीं उठा सकता ,जबकि मामूली सी चींटी सहजता है शक्कर पा लेती है –

कह रैदास तेरी भक्ति दूरि है ,भाग बड़े सो पावै
तजी अभिमान  मेटी आपा पर पिपिलक हवे चुनि खावे

माना जाता है कि मीराबाई ने रैदास को अपना गुरु माना था .मीरा के पदों में इसका वर्णन मिलता है –








गुरु रैदास मिले  मोहि पूरे ,धुरसे कलम भिड़ी
सत गुरु सैन दिए जब आके रली
गुरु मिलिया रविदास जी ,दीन्ही ज्ञान की गुटकी
चोट लगी निज नाम हरि की म्हारे हिवडै खटकी 
वर्णाश्रय अभिमान तजि ,पद रज बंदहि जासु की 
संदेह ग्रंथि खंडन निपन ,बानि विमुल रैदास की 
गुरु ग्रन्थ साहिब में रैदास के पदों का भी संकलन है .

संत कवि रैदास का जीवन चरित उनकी शिक्षायें श्रेष्ठ समाज की परिकल्पना को यथार्थ में आदर्श समाज स्थापित कर सकता है। 

Sunday, January 21, 2018

vasant panchami


वसंत पंचमी 









माघ माह की पंचमी  .... मतलब वसंत पंचमी  ....
वसंत पंचमी मतलब ..  .. आगमन  ऋतुओं की रानी का  ....
.षट  ऋतुओं में सबसे सुन्दर  .... सबसे मन मोहक
 ऋतु  जिसके आगमन में  सारी  प्रकृति  जैसे शृंगारित होकर रंग-बिरंगे फूल और सुगंध बिखेर कर स्वागत  कर रही है  .....
जिसके आविर्भाव से खेतो ने पीली साड़ी पहन ली है  .....
आम्र टहनियां बौर लगा कर झूम रही है  ....
पेड़ -पौधों से फूटती कोपलें जैसे उल्लास प्रकट कर रही है ..    ...
. कोयल कूक-कूक कर उद्घोषणा कर रही है  ....
हवा फूलों का रस -पान कर मादक हो रही है  .....
तितलियाँ असमंजस में इधर-उधर उड़ रही है  -किस फूल का रसास्वादन करूँ  ...
मतवाले भंवरों का गुंजार कानों में रस घोल रहा है  ..
.कहीं  महक है  , गमक  है ...यह जन्मोत्सव है ज्ञान -विज्ञानं ,संगीत और कला की अधिष्ठात्री शक्ति माँ सरस्वती  का ..जो शुभ्र है ,निर्मल है ,सहज है , धवल है ,शांति और नीरवता की प्रतिमूर्ति है। 
जिसे इनमे से कुछ भी कहा जा सकता है -वागीश्वरी  .. शारदा ..  वाग्देवी  ....  वीणा पाणि  या पद्मासना
श्री पंचमी है आज। .. ऋतु  संहार में कालि दास ने इसे सर्व प्रिये चारुतर वसन्ते कहकर अलंकृत किया है। श्री मद्भगवद गीता में श्री योगेश्वर कृष्ण ने कहा है -ऋतूनां कुसुमाकर: अर्थात मै ऋतुओं में वसंत हूँ।
दुर्गा सप्तशती में कहा गया है कि समस्त विश्व में जो चेतना व्याप्त है ,वह महा सरस्वती ही है। सभी प्राणियों में चेतना ,बुध्दि ,शक्ति,तृष्णा ,शांति,लज्जा आदि अनेक  रूपों में रहनेवाली महासरस्वती को प्रणाम। सभी इन्द्रियों की अधिष्ठात्री सभी जीवों में सदा वास करती है।  चेतना रूप में समस्त विश्व को व्याप्त कर रहने वाली देवी सरस्वती हमारा कल्याण करें।
हम भी पवित्र दिन -
अपनी इन्द्रियों द्वारा सद्ज्ञान का संग्रह कर अपने अंतर में स्थित चेतन तत्व को उर्ध्व मुखी बनाये तथा श्रेष्ठ मनुष्य बनना ही महा सरस्वती की श्रेष्ठ आराधना है। 
सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना करने के बाद सृष्टि ऐसी न थी। सर्वत्र निस्तब्धता  .... न कोई उत्साह  ,न कोई उमंग  . सिर्फ नीरवता   .... इस नीरस सृष्टि को उत्साह और उमंग से भरने के लिए ब्रह्माजी ने अपने कमण्डल से सर्वत्र जल छिड़का। धरती पर सर्वत्र हरियाली छा गई। धरा पर एक तेजस्वी देवी प्रकट हुई ,जिसके चतुर्भुजों में से एक हस्त में पुस्तक ,एक में माला और दो हस्त वीणा धारण किये हुए थी। ब्रह्माजी ने देवी से वीणा के सप्त तारों को झंकृत करने को कहा, वीणा के  मधुर स्वर चहुँ दिशा में फ़ैल गए। वीणा के स्वर के प्रभाव  से समस्त प्राणियों को वाक्शक्ति प्राप्त हुई।
सरस्वती पूजन का प्रचलन भगवान श्री कृष्ण से जुड़ा हुआ माना है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्री कृष्ण के अलौकिक रूप से आसक्त देवी सरस्वती ने भगवान श्री कृष्ण के समक्ष स्वयं को भार्या रूप में वरण करने का निवेदन किया ,किन्तु भगवान श्री कृष्ण ने समुचित कारण बतलाते हुए प्रस्ताव को स्वीकारने करने में असमर्थता प्रकट करते हुए ,देवी सरस्वती को पूजनीय होने का वरदान दिया और कहा कि-माघ माह में शुक्ल पक्ष की पंचमी को विद्या प्रदायिनी देवी के रूप में तुम्हे पूजा जायेगा।विद्यारंभ करते समय देव-दानव ,यक्ष गन्धर्व ,नर -नारी सभी तुम्हारी पूजा करेंगे। जगद गुरु योगेश्वर कृष्ण ने भी स्वयं माँ सरस्वती की अर्चना की।
माँ सरस्वती की आराधना से ही कवित्व ,साहित्य सृजन ,संगीत में निपुणता ,वाक्पटुता और तर्क शक्ति प्राप्त होती है। महर्षि वाल्मीकि और व्यास भी सरस्वती की आराधना करके ही रामायण और महाभारत की रचना की। कालिदास ने माँ सरस्वती की आराधना करके महाकवि का सम्मान पाया।
तंत्र शास्त्र में माघ शुक्ल पंचमी को लक्ष्मीअति प्रसन्न मुद्रा में होती है। इस दिन लक्ष्मी  -उपासना को अतिशुभ बतलाया गया है। यही एक ऐसा दिन होता है जब दोनों देवियाँ लोक कल्याणार्थ एकचित होती है। इन दोनों देवियों की प्रिय तिथि होने के कारण वसंत पंचमी का महत्व  और भी बढ़ जाता है।
वसंत पंचमी स्वयं सिध्द मुहूर्त है ,इस दिन कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ किया जा सकता है।


रामायण एवं रामचरित मानस में वर्णित हुआ दण्डक अरण्य में शबरी द्वारा   भगवान श्री राम को जूठे बैर खिलाने  का प्रकरण का दिन भी वसंत पंचमी को हुआ माना  जाता है.
इसी दिन भगवान विष्णु के साथ -साथ कामदेव-रति की भी पूजा की जाती है। वसंत को कामदेव का मित्र माना जाता है।मत्स्य पुराण में वर्णित बताया गया है।
वसंत पंचमी का ऐतिहासिक महत्त्व भी है।यह दिन  पृथिवी राज चौहान -चंद्र वरदाई  तथा राम सिंह   कूका  का भी स्मरण दिलाता है।
सरस्वती पुत्र काव्य शिल्पी सूर्य कांत त्रिपाठी  निराला का जन्म-दिन भी वसंत पंचमी को ही हुआ था।
माँ सरस्वती के प्रमुख मंदिर -
मैहर देवी का शारदा मंदिर मध्यप्रदेश में
पुष्कर का सरस्वती मंदिर-राजस्थान में
श्रंगेरि का शरादाम्बा  मंदिर
श्री ज्ञान सरस्वती मंदिर -आंध्र प्रदेश
कोट्टयम का सरस्वती मंदिर -केरल 

Wednesday, January 10, 2018

swami vivekanand avataran divas -yuth day of nation






स्वामी विवेकानन्द अवतरण दिवस 














१२ जनवरी ,१८६३

१२ जनवरी , इसी दिन अवतरण  हुआ था तेजस्वी ओजस्वी ,वैचारिक क्रांति के अग्रदूत और राम कृष्ण परम हंस के उत्तराधिकारी राष्ट्र युवा संत स्वामी विवेकानन्द का ,जिनकी प्रखर वाणी ने १८९३ में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मलेन में प्रबुद्ध श्रोताओं  को अपने उद्बोधन से अभिभूत कर विश्व समुदाय का ध्यान भारत की ओर  आकर्षित किया ।१२ जनवरी स्मरण कराता है ,उस युवा सन्यासी का जिसने प्रमाणित किया कि महत्वपूर्ण यह नहीं कि जीवन कितना लम्बा जिया गया ,महत्वपूर्ण यह है कि जीवन कितना सार्थक जिया गया। निरर्थक लम्बे जीवन से कहीं ज्यादा अच्छा है ,छोटा किन्तु सार्थक जीवन। 
पुण्य भूमि भारत की धरा पर अवतरित होकर ३९ वर्ष की अल्पायु में ही धर्म की  सटीक व्याख्या कर उन तथाकथित तार्किक प्रबुध्द वर्ग की बुद्धि मलिनता का प्रक्षालन कर सत्य का साक्षात्कार कराया।  उनका तेजोमय मुख मंडल आज भी देदीप्यमान नक्षत्र की भांति हृदयाकाश में प्रदीप्त है। दैहिक रूप से न सही ,उनकी अमर वाणी आज भी भारत के युवाओ का मार्ग प्रशस्त कर रही है

यदि आपकोअपने आप पर विश्वास नहीं ,तो आप ईश्वर पर भी विश्वास नहीं कर  सकते।
एक समय में एक काम करो ,और सब भूल जाओ ,उसी एक काम में अपनी आत्मा डाल दो।
आवश्यक नहीं कि  रिश्ते  संख्यां में ज्यादा हो। रिश्ते भले ही  कम हो , किन्तु उनमे जीवन हो।
नायक बनो और निर्भीक होकर कहो -मुझे कोई भय नहीं।


स्वामी विवेकानंद ,जिन्होंने भारत के गौरव को  भौगोलिक  सीमाओं  के पार  पहुँचाकर   आध्यात्मिक  श्रेष्ठता  के पद  पर  आसीन  करने  में  अहम भूमिका निभाई ,   स्वामी विवेकानंद ,जो निर्धन और दरिद्रों  के सेवा करने के लिए ही भारत की धरती पर अवतरित हुए थे ,जिन्होंने   मानव सेवा को ही परमात्मा  की सेवा माना और इसे ही अपने जीवन का ध्येय बनाया। जिसने इस अवधारणा को स्थापित  किया कि समस्त  प्राणी  परमात्व  का  ही अंश  है। जिसने सपनो  का  एक ऐसा  संसार बनाना चाहा  जिसमे  न धर्म  का भेद  हो , न जाति  का।

सब कुछ खो देने से ज्यादा बुरा है -उम्मीद को खो देना। उम्मीद के भरोसे हम खोये हुए को फिर से पा सकते है किन्तु उम्मीद ही खो दी तो फिर कुछ नहीं पाया जा सकता।

अपना जीवन एक लक्ष्य पर केंद्रित करो। अपने पूरे शरीर को उस लक्ष्य से भर लो और अन्य सभी विचारों को निकल कर फेंक दो। यही  सफलता का मन्त्र है।

मनुष्य को कर्म करते रहना चाहिए ,दुनिया परिहास करें या तिरस्कार ,परवाह मत करों।





स्वामीजी ने  आध्यात्म और भौतिकता  के मध्य समन्वयक  बनकर समता के सिद्धान्त का  प्रति  पादन किया ।इस  युवा  संत ने  हिन्दू  धर्म  को  विश्व को  सहिष्णुता  तथा  सार्वभौम  स्वीकृत  दोनों  की  शिक्षा  देने वाला प्रमाणित किया ।  इसी युवा राष्ट्र संत ने  हिन्दू धर्म को विदेशी धरती पर खड़े होकर स्वयं को भारत भूमि पर जन्म लेने को अपना सौभाग्य और गर्वित  होने का उद्घोष किया था। भारत की स्तुति में कहा था कि  भारत विश्व की वह थाती है जो विश्व को वह दे सकती है ,जिसकी विश्व को सबसे अधिक आवश्यकता है। पश्चिम के पास यदि भौतिकता है ,तो पूरब  के पास आध्यात्मिकता का अकूत भण्डार।

जिस समय जिस काम के लिए प्रतिज्ञा करो ,उसी समय उस काम में लग जाना चाहिए अन्यथा लोगों का विश्वास उठ जायेगा।

अपने स्वाभाव के प्रति ईमानदार होना ही सबसे बड़ा धर्म है।

असंभव से आगे निकल जाना ही  संभव को जानने का एक मात्र उपाय है।


दिन में  कम  से कम  एक बार अपने आप से स्ववार्ता  अवश्य करें अन्यथा आप दुनिया के एक श्रेष्ठ मनुष्य के साथ एक बैठक गवां देंगे।





 उन्होंने   भारत  भूमि को  विभिन्न  धर्म  विजातीय  शरणाथियों की  शरणागत स्थली  बतलाया।  धर्म  और दर्शन की पुण्य  भूमि  से उपमित   किया।  उन्होंने  भारत  को मानव  जीवन  के सर्वोच्च आदर्श  और  मुक्ति  का द्धार  बतलाया।  उन्होंने  पुरज़ोर  शब्दों  में  उद्घोष  किया था-  अध्यात्म  ज्ञान  और भारतीय  दर्शन  के अभाव   में  समस्त  विश्व  अनाथ  हो  जाएगा। भारत  के संदर्भ  में   उनका  यह कथन कि भारत  धरा पर  मानवता   का द्वारक  है,   अपनी जन्म भूमि के बारे उद्भासित विचार उन्हें राष्ट्र संत होने के पद पर आसीन करता है।

हज़ारों ठोकरे  लगने के बाद ही अच्छे चरित्र का निर्माण होता है।


किसी मक़सद के लिए खड़े हो तो एक  पेड़ की तरह ,गिरो तो एक बीज की तरह ,ताकि फिर से उसी मक़सद  के लिए उठ खड़े हो सको ।


जो अग्नि गर्मी दे सकती है ,वह जला  भी सकती है लेकिन इसके लिए  दोष अग्नि का नहीं दिया सकता ।


राष्ट्र को आवश्यकता है -फौलादीमांसपेशियों और व्रज के समान  स्नायुओ की  ... जितना विलाप करना था ,कर लिया। 
अब विलाप करना  छोड़कर मनुष्य बनो। .आत्म -निर्भर मनुष्य 


स्वामीजी दुखों  का कारण  मानते  हैं -मनुष्य के भीतर के भय और उन कामनाओं को जो पूर्ण नहीं हो सकी। भय दुर्बलता का चिह्न है। भविष्य की आशंका और साहस की कमी से ही मनुष्य असफल होता है।  जीवन में सफल होने के लिए स्वामी जी कहते थे कि  जीवन का एक ही लक्ष्य बना लो ,उस लक्ष्य का पाना ही जीवन का उद्देश्य बन जाये ,अन्य सभी लक्ष्य को भूल जाओ। जन्म ,मृत्यु ,बुढ़ापा और रोग ये सब सार्वभौमिक सत्य है। इन सब से भयभीत नहीं होना चाहिए।  आत्मा के अतिरिक्त अन्य कोई गुरु नहीं। जितना मनुष्य की आत्मा मनुष्य को सीखा  सकती है ,उतना और कोई नहीं।


 ऐसा कभी मत सोचिये कि  आत्मा  के लिए कुछ भी असंभव है ,ऐसा सोचना भी पाप है।  अपने को  या किसी अन्य को  को निर्बल मनना ही सबसे बड़ा पाप है।
कंभी  किसी की निंदा ना करें। यदि आपके हाथ किसी की सहायता के बढ़  सकते है तो ज़रूर बढ़ाइये  और यदि नहीं तो ,अपने हाथ जोड़कर अपने भाइयों को उन्हें उनके मार्ग पर जाने का आशीर्वाद दीजिये।


शक्ति जीवन है ,निर्बलता मृत्यु है। जीवन विस्तार है और मृत्यु संकुचन है। प्रेम जीवन है और द्वेष मृत्यु।


 स्वस्थ विचारों से ही  स्वस्थ शरीर का निर्माण होता है।  अपने आप को शक्तिशाली और अपने आप को विश्वास दिलाओ कि  मुझे कोई भय नहीं। सही मायने में जीना उसी का सार्थक है जो दूसरों के लिए जीता  है। ,,अपने लिए जीना तो पशु प्रवृति है।
निर्भय होना अस्तित्व का रहस्य है ,इस बात की आशंका ना रखों कि तुम जीवन में क्या बनोगे ,किसी पर निर्भर ना रहो जिस क्षण तुम सबकी सहायता अस्वीकार कर डोज ,उसी क्षण  तुम मुक्त हो जाओगे।

साहसी अकेला ही उस   महान  लक्ष्य को प्राप्त कर सकता जिसे बहुत सारे मिलकर भी प्राप्त नहीं कर सकते।
हम  वही है जो हमें हमारी सोच ने  बनाया है ,इसलिए इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि  हम क्या सोचते है। शब्द गौण है ,विचार प्रमुख है।



जीवन का उद्देश्य बतलाते हुए स्वामीजी ने कहा था - खड़े हो जाओ ,शक्तिशाली बनो ,सारा उत्तरदायित्व अपने कंधे पर डाल लो  अपने भाग्य के निर्माता स्वयं को मानो। सफलता का आनंद उठाने के लिए कठिनाइयों का होना अनिवार्य है। जीवन की राह भाग्य प्रदत्त नहीं होती ,जीवन राह स्वयं बनानी पड़ती है। लोग क्या कहेगे इस बात की चिंता मत करो। बस ,अपने कर्तव्य पथ पर बढते  रहो। चाहे जो हो जाये अपनी मर्यादा का कभी उल्लघन मत करों। समुंद्र अपनी मर्यादा लाँघ  देता है ,लेकिन तुम मत लाँघना। ,समुंद्र  से भी ज्यादा विशाल बन जाओगे।

Friday, December 29, 2017

ssuman-mujhe kuchh kahana hai.blogspot.com: मैं समय हूँ......

ssuman-mujhe kuchh kahana hai.blogspot.com: मैं समय हूँ......: मैं  सम य हूँ... ...  count down शुरू हो गया new year का ...अधिकांश लोगों ने तो मेरे wel-come की तैयारियां भी कर ली है ,लेकिन मुझे आज ...

मैं समय हूँ......

मैं  समय हूँ...... 
count down शुरू हो गया new year का ...अधिकांश लोगों ने तो मेरे wel-come की तैयारियां भी कर ली है ,लेकिन मुझे आज बात करनी है उन लोगों से ,जो पूरे साल मुझे खर्च करते रहे.....  मेरे बेशकीमती मोतियों को काँच की तरह लुटाते रहे  . अपनी गलतियों को छुपाने के लिए मुझे भला-बुरा कह रहे  है .वे मुझ पर blame लगा रहे  है ,मै बहुत बुरा हूँ ..मै क्रूर हूँ ...मै निर्दय हूँ ..मै किसी का सगा नहीं हूँ ..मैंने उन्हें तबाह कर दिया ..बरबाद कर दिया ....कोई कह रहा है ,मै जल्दी-जल्दी चलता हूँ ,कोई कह रहा  है ,मै धीरे-धीरे चल रहा हूँ ,कोई कह रहा है ,मै ठहर गया हूँ .ये सारे आरोप बेबुनियाद है ,मिथ्या है  
मुझे बड़ी पीड़ा होती है ,जब कोई मुझ पर ऐसे अनगर्ल आरोप लगते है .मै ऐसे लोगों को बताना चाहता हूँ कि न मै बहुत बुरा हूँ ..न मै क्रूर हूँ ...न मै निर्दय हूँ ..यह ठीक है कि मै किसी का सगा नहीं हूँ,लेकिन मै पक्षपाती भी नहीं हूँ  ..मैंने न उन्हें तबाह किया और न  ..बरबाद ,अगर वे तबाह हुए है ...बरबाद हुए है तो सिर्फ और सिर्फ खुद की गलतियों से . न मै जल्दी चलता हूँ और न धीरे ....और न किसी के लिए ठहरता हूँ .मै तो सिर्फ अपनी चाल से चलता हूँ .८ घंटे तुमने काम किया ...... ८ घंटे तुमने सोने में बीता दिए , बाकी ८ घंटे क्या किया ?यह सोचा कभी ? 
मुझ पर आरोप लगाने से पहले ऐसे लोग यह क्यों नहीं सोचते कि भगवान ने उन्हें भुजबल के साथ –साथ बुध्दिबल भी प्रदान किया है .क्यों नहीं वे मेरा सदुपयोग करते है .मै यदि मुफ्त में  उपलब्ध हूँ ,तो इसका मतलब यह तो नहीं कि वे मेरा दुरुपयोग करें .यदि वे मेरा सम्मान नहीं करते ,तो मै क्यों उनका सम्मान करूँ ?  इतिहास उठाकर देख ले, जिन –जिन लोगो ने मेरा सम्मान किया ,मैंने उन्हें आसमान की उचाईयों पर पहुंचा दिया . दुनिया में जितने भी महान लोगों ने दौलत –शौहरत पाई है ,उनकी कोशिशों के साथ –साथ  मैंने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है .
मै बहुत बड़ा भी हूँ और बहुत छोटा भी ,लेकिन यह बात वही जान सकता है ,जिसने मेरा भरपूर उपयोग किया हो .


जो मुझे छोड़कर शेष सारे कार्य planning करके करता है ,मै उसके सारे plan पर पानी फेर देता हूँ .एक बात जो मुझे पुरजोर शब्दों में इन्सान से कहनी है, वह यह कि  इन्सान के जीवन जीवन में जीतनी भी महत्वपूर्ण चीजे है –उसमे मै सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हूँ .मुझे खोने का मतलब है –अपनी सबसे अमूल्य वस्तु खो देना .बेंजामिन फ्रेंकलिन ने मुझे बहुत नजदीक से पहचाना। देखिये कितने सटीक ढंग से परिभाषित किया है उन्होंने मुझे -समय आपके जीवन का सिक्का है। आप ही को यह तय करना है कि मुझे कहाँ और किस तरह खर्च करना है। सावधान रहो। अन्यथा इसे कोई और खर्च कर देंगा।   
जीवन में यदि बनने की या कुछ पाने कि चाहत है तो सबसे पहले मेरा सम्मान करना सीख लो ,फिर देखो –मै तुम्हे क्या नहीं दे सकता ?मुझे साथ लेकर चलोगे तो तुम्हारा आधा काम तो मै ही पूरा कर दूंगा .तुम मुझसे आगे चलकर भी कुछ नहीं पा सकोगे और न मुझसे पीछे रहकर ,मुझे साथ रखकर ,मेरे साथ-साथ चलकर ही तुम अपने mission में sucsses हो सकते हो .सपने देखते रहनेवालों और जो हो गया उसका रोना रोनेवालों से मुझे बहुत चिढ है
कुछ लोग मेरा इंतजार करते है ,यह सोच कर कि शायद मै उनके लिए कहीं से आऊंगा ,लेकिन वे नहीं जानते कि मै उनके ही साथ था ,वह मुझे पहचान ही नहीं पाए .मै उनसे दूर था या यूं कहो कि मै उनके पास नहीं था ,यह रोना वही लोग रोते है ,जिन्होंने मेरी planning नहीं की .
मनुष्य को अपने बुध्दिबल और भुजबल पर बड़ा घमंड है ,वह किसी भी चीज को छोटा या बड़ा बना सकता है .लेकिन मै दावे से कह सकता हूँ कि अपने को बाहुबली समझनेवाला मनुष्य मेरा नैनो पार्ट भी कम अथवा ज्यादा नहीं कर सकता .
मनुष्य को इस विषय पर ज्यादा सोचने की आवश्यकता है कि मै उसके पास जितनी रहा ,उसने मेरा कितना अधिकतम उपयोग किया ?   
मै तो बीज की तरह हूँ ,मुझे बोते जाओ ,फसल काटते जाओ ,यदि बाँध कर रख दिया तो सड़-गल कर नष्ट हो जाऊंगा .मै अपने बारे में एक बात दावे से कहूँगा ,वह यह कि तुम अपनी सारी दौलत लुटा कर भी ,फिर से उतनी दौलत पा लोगे ,लेकिन मुझे खोकर ,खोये हुए का एक पल भी नहीं पा सकोगे। 

मूर्ख समझते है कि वे मुझे नष्ट कर रहे है ,जबकि वे यह नहीं जानते कि वे स्वयं को नष्ट कर रहे है .

मुझ से बेहतर सलाहकार कोई और नहीं होगा। एक मुफ्त की सलाह दूंगा -यदि भविष्य को खुशहाल बनाना चाहते हो तो मेरे वर्तमान का एक -एक पल को सार्थक काम में लगा दो।  


नया साल शुरू होने वाला है .... नए साल की planning कर लो........ एक नए संकल्प के साथ ..जिस तरह नया घर बनाते समय  नक्शा बनाते हो ,वैसे ही पूरे साल का नक्शा आज ही बना लो  ....  कब और किस समय  क्या करना है ..... वरना फिर मुझे ही दोषी ठहराओगे ।मै विश्वास दिलाता हूँ ,यदि तुमने दृढ़ता से अपने संकल्प का पालन किया तो निश्चित ही तुम्हारा new year यथार्थ रूप में happy होगा  ... मै  अपना १००% दूँगा। .वायदा है मेरा।  

Sunday, December 17, 2017

valmiki ramayan ki sooktiyan


वाल्मीकि रामायण की सूक्तियाँ 














विषैला सांप और शत्रु भी उतना नुकसान नहीं पहुंचा सकते जितना मुँह पर मित्रता का ढोंग कर मन में कपट रखनेवाला मनुष्य नुकसान पहुंचा सकता है .

मध्यम मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ है .अत्यधिक प्रेम और अत्यधिक शत्रुता दोनों ही घातक है .           
बिना विचार किये कर्म करनेवाले को वैसे ही पछताना पड़ता है ,जैसे पलाश के पेड़ कि सेवा करनेवाले
को पछताना पड़ता है
गुरु भी दंडनीय हो सकता है यदि वह करणीय और अकरणीय का भेद भूलकर कुपथगामी हो जाये
        
क्रोध मनुष्य के विवेक को जलाकर नष्ट कर देता है .ऐसा मनुष्य न करने योग्य कार्य भी कर जाता है और न बोलने योग्य भी बोल जाता है .
                                                                  
वीर आत्मश्लाघा नहीं करते वरन कर्म करते है अर्थात रिक्त बादलों की तरह व्यर्थ गरजते नहीं

भाग्य पर भरोसा करनेवाले कायर होते है
धर्म ही संसार का सार तत्व है .सब कुछ धर्म से  ही प्राप्त होता है

सत्य ही ईश्वर है ,धर्म भी सत्य के ही अधीन है ,सत्य ही मूल है ,सत्य के अतिरिक्त कुछ अन्य नहीं .

कर्मानुसार ही फल मिलता है .कर्ता को अपने अच्छे –बुरे कर्मो का फल भोगना ही पड़ता है .

जीना उसका सार्थक है जिससे अन्य आश्रय पाते  है .पराश्रित होकर जीना मृत तुल्य है

सुख सदैव नहीं रहते. सुख में बिताया हुआ अत्यधिक समय भी थोडा ही जान पड़ता है

उत्साही मनुष्य के लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं ,उत्साह में अत्यधिक बल होता है ,उत्साही ही कर्म की  ओर प्रवृत होता है .उत्साह ही कर्ता के कर्म को सफल बनाता है

पराक्रम दिखाने के अवसर पर हताश –निराश हो जानेवाले का तेज नष्ट हो जाता है और उसे पुरुषार्थ  प्राप्ति नहीं होती ,कालांतर में ऐसे मनुष्य कई तरह के कष्टों से घिर जाते है .ऐसे मनुष्य को सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती .
उत्साह,सामर्थ्य और दृढ़ता ये तीनों कार्य सिध्दि में सहायक है

उपकार मित्रता का और अपकार शत्रुता का लक्षण है
मित्रता करना आसान है किन्तु निभाना कठिन है

सच्चा मित्र वही जो विपत्ति में साथ दे और कुमार्ग पर आ जाने पर मित्र को फिर से सुमार्ग पर ले आये

अच्छा मित्र घर में रखे आभूषण के समान है